मॉडर्न इंडियन सिनेमा में वल्गैरिटी का आरोप नया नहीं है. इंडस्ट्री से जुड़े लोग कहते हैं यह स्टोरी की डिमांड है तो दूसरे कहते हैं यह दर्शकों को रिझाने का चलताऊ फंडा है. इश्यू बड़ा है. बहस भी पुरानी है. आई नेक्स्ट ने इस पर खुली बातचीत की. सेंसिबल एक्टर के तौर अपनी खास पहचान रखने वाले मनोज बाजपेयी से. वे मंडे की सुबह आई नेक्स्ट द्वारा आयोजित आई-लेक्चर में खुल कर बोले.

स्टोरी की मांग होती है
जागरण समूह के रश्मि कांपलेक्स स्थित सेमिनार हाल में इस अवसर पर मनोज बाजपेयी ने कहा कि जिसे वल्गैरिटी कहा जा रहा है, वह कई लेवल्स पर स्टोरी की मांग होती है. ऐसे सीन पर बहस की गुंजाइश बनती है. उन्होंने कहा कि यह फिल्म हिट कराने का फार्मूला भी हो सकता है और फिल्मकार को अपनी बात कहने का जरिया भी. फिल्म मेकिंग एक क्रिएटिव वर्क है, जिसे नैतिकता के बंधन में नहीं बांधना चाहिए.

इंटेनशन देखना जरूरी है
मनोज बाजपेयी ने कहा कि किसी भी फिल्म की कहानी में डायरेक्टर का इन्टेंनशन दिखता है. अगर कहानी के अनुरूप कोई सीन नहीं होता है तो दर्शक भी समझ जाते हैं. अगर सेंसर बोर्ड को किसी सीन पर आपत्ति होती है और डायरेक्टर का इन्टेन्सन सही है तो डायरेक्टर के पास वैलिड लॉजिक होगा और अगर इन्टेसन सही नहीं होगा तो कोई लॉजिक नहीं होगा.

इंटरनेट का क्या कीजिएगा
फिल्मों को देखकर सोसाइटी में चेंज आते हैं, यह आम धारणा रही है. ऐसे में वल्गैरिटी सोसाइटी पर कितना इफेक्ट डालेगा, सवाल पर मनोज ने स्पष्ट कहा कि सिनेमा की जिम्मेदारी फिक्स करने की बात होती है, लेकिन कंप्यूटर और इंटरनेट जैसे माध्यम कैसे फिक्स किए जाएंगे. जब वल्गैरिटी फैला सकने वाले साधन, कंप्यूटर और इंटरनेट सबकी हाथों में हैं, तो सिनेमा की ही जिम्मेदारी फिक्स क्यों हो.

व्यूअर्स को मिले आजादी
फिल्मों में सीन की कांट-छांट को लेकर मनोज बाजपेयी सेंसरशिप से नाराज दिखे. उन्होंने कहा कि कोई भी सीन है जिसमें कुछ ऑब्सीन या वल्गर है या फिर उसमें गाली-गलौज है, तो उस पर सीधे कैंची ही चले, यह बात ठीक नहीं. गाली-गलौज तो हर जगह सुनने को मिलती है तो सिनेमा को इससे क्यों दूर किया जाता है. मैं फिल्में चुनता हूं जब मैं डायरेक्टर और स्क्रिप्ट से सहमत होता हूं. अब अगर एक्टर और डायरेक्टर तैयार हैं तो फिल्म का फैसला करने का हक व्यूअर्स को मिले.

फिल्मकारों पर प्रेशर होता है

दिल पे मत ले यार जैसी फिल्मों को डायरेक्ट करने वाले हंसल मेहता भी मनोज बाजपेयी की बातों से ही इत्तेफाक रखते हैं. उन्होंने कहा कि फिल्में एक्सप्रेशन का जरिया हैं, इन्हें सेसरशिप में बांधना वल्गैरिटी होगी. फिल्मकारों पर प्रेशर होता है वे साफ सुथरी फिल्म बनाएं. एकता कपूर की हर मूवी में सेक्स एक एंगल होता है, लेकिन मैं इसमें वल्गैरिटी नहीं देखता.