जन्म से नहीं बनी थी आहार नली, डॉक्टरों ने आहार नली बनाकर दी नई जिंदगी

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LUCKNOW:

झांसी के अरविंद यादव के घर 13 अप्रैल 2016 को बेटी गुनगुन ने जन्म लिया. गुनगुन के जन्म के कुछ समय बाद ही परिवार चिंतित हो गया, जब उसे पता चला कि उसकी आहार नली ही नहीं बनी है. उसे जो दूध पिलाया जाता है, वह उसके फेफड़ों में चला जाता है. इस बीमारी को इसोफैगल अट्रेसिया कहते हैं. बच्ची के परिजन काफी उम्मीदों के साथ केजीएमयू आए, जहां डॉक्टरों ने गुनगुन की आहार नली बना उसे नई जिंदगी दे दी.

तीन बार में हुई सर्जरी

बच्ची के जन्मजात आहार नाल न होने की जानकारी मिलने पर डॉक्टरों की सलाह पर अरविंद अपनी बेटी को लेकर 17 अप्रैल 2016 को केजीएमयू में पीडियाट्रिक सर्जरी के डॉ. जेडी रावत के पास आए. उन्होंने जांचे कराई तो पता चला कि पेट (आमाशय) और मुंह से पेट की तरफ जाने वाली खाने की नली के बीच की आहार नली ही नहीं बनी है. डॉ. जेडी रावत ने 17 अप्रैल 2016 को ही बच्ची का पहली बार ऑपरेशन किया. खाने की ऊपरी नली को गर्दन से निकाला गया ताकि थूक बाहर निकलता रहे. साथ ही पेट से दूध देने के लिए नली डाली गई.

दो वर्ष तक नली से पिया दूध

इसके बाद बच्ची दो वर्ष तक इस नली के सहारे ही दूध पीती रही. उसका दूसरा ऑपरेशन 7 मार्च 2018 को किया गया. जिसमें खाने की नली को काटकर आहार नली बनाई गई. नली बनाने के लिए आमाशय के एक हिस्से का प्रयोग किया गया. इसे फिर पेट में रखा गया. इसके बाद 26 जुलाई 2018 को जांच की तो देखा कि पेट में बनाई गई आहार नली ठीक है. उसी दिन नली को अलग कर ऊपर मुंह के नली को आहार नली के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा गया और नीचे आमाशय से भी जोड़ दिया गया. जिसके बाद बच्ची अब एकदम ठीक है और दूध भी पी पा रही है.

10 हजार में एक को बीमारी

डॉ. जेडी रावत ने बताया कि यह बीमारी दस हजार बच्चों में से एक को होती है. वह अब तक ऐसे 20 ऑपरेशन कर चुके हैं. जिनमें 19 बच्चे एकदम ठीक हैं. लेकिन यह ऑपरेशन इसलिए खास है क्योंकि आमतौर पर इस बीमारी में आईसीयू व वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है. जबकि इस ऑपरेशन में अपनी खुद की खोजी गई विधि से ऑपरेशन बिना वेंटीलेटर के सफलतापूर्वक किया गया. बाहर इस ऑपरेशन के लिए डेढ़ लाख तक का खर्च आता है लेकिन केजीएमयू में तीनों ऑपरेशन 30 हजार में ही हो गए.

ये टीम रही शामिल

ऑपरेशन में पीडियाट्रिक सर्जरी से प्रो. जेडी रावत के अलावा डॉ. सुधीर सिंह, डॉ. गुरमीत सिंह और एनेस्थीसिया से डॉ. सरिता सिंह व उनकी टीम शामिल रही. ओटी स्टाफ में सिस्टर वंदना, संजय सिंह और पुष्पा ने योगदान दिया.