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LUCKNOW : यह अटल जी की सादगी भरी शख्सियत में ही संभव है। उन्होंने लखनऊ को दिया तो बहुत कुछ, लेकिन अपने लिये कुछ भी नहीं लिया। न सिर्फ उन्होंने ज्वैलरी से दूरी बनाए रखी बल्कि, गाड़ी के नाम पर पुरानी अंबेस्डर कार के मालिक रहे।वर्ष 1953 में पहली बार अटल जी लखनऊ संसदीय क्षेत्र से ही चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। हारने के बाद भी लखनऊ से उनका लगाव कम न हुआ और वह 1991 में फिर से लखनऊ से चुनाव लड़े, लेकिन इस बार लखनऊवासियों ने उन्हें संसद में अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजा। यह सिलसिला 14वीं लोकसभा के लिए 2004 में हुए लोकसभा चुनाव तक चलता रहा। इस बीच संसद में नेता प्रतिपक्ष के अलावा अटल जी तीन बार प्रधानमंत्री भी बने।

भवन- भूखंड तक नहीं खरीदा

जहां ज्यादातर नेताओं में संपत्ति बनाने की होड़ लगी रहती है, वहीं लगातार 19 साल तक लखनऊ से सांसद रहने के बावजूद अटल जी ने यहां कोई भवन- भूखंड तक नहीं खरीदा। वह चाहते तो लखनऊ विकास प्राधिकरण से कोई भी भवन-भूखंड आसानी से ले लेते।  प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष और वर्तमान में लखनऊ से सांसद व केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सांसद प्रतिनिधि दिवाकर त्रिपाठी बताते हैं कि सांसद रहते अटल जी नियमानुसार सीधे एलडीए से भवन या भूखंड ले सकते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसके लिए इच्छा तक नहीं जाहिर की। हालांकि, बहुत से दूसरे सांसद या विधायक चुने जाने के साथ ही प्राधिकरण-परिषद से भवन-भूखंड लेने के लिए दौडऩे लगते।

बस एक पैतृक मकान
अटल जी ने लखनऊ में भवन-भूखंड तो लिया नहीं, वह गहनों से भी दूर रहे। 2004 में जीवन का आखिरी लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए 15 अप्रैल को उन्होंने नामांकन पत्र के साथ अपनी चल व अचल संपत्तियों के बारे में जो शपथ पत्र दाखिल किया उसको देखने से साफ है कि उन्होंने न कृषि भूमि और न ही गैर कृषि भूमि ली। तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके अटल से मुकाबला करने के लिए तब चुनाव मैदान में उतरने वाले निर्दलीय राम जेठमलानी रहे हों या कांगे्रस के डॉ। अखिलेश दास या फिर सपा की डॉ। मधु गुप्ता सभी के पास तब अटल जी से कई गुना ज्यादा संपत्ति थी। अटल जी के पास 20 हजार रुपये नकद व बैंक में करीब तीस लाख रुपए थे और 28 लाख के दिल्ली व ग्वालियर में पैतृक आवास थे। अटल जी ने 1995 माडल की एक अंबेस्डर कार ले रखी थी।

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