क्यों मनाते हैं भाई दूज
भैय्या दूज या भाईदूज में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य और लंबी आयु के लिए आर्शिवाद देती हैं। वहीं भाई बहनों को कुछ उपहार या नकद पैसा देता है। भाईदूज दिवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। ये वो त्योहार है जो भाई और बहन के एक दूसरे के प्रति स्नेह को अभिव्यक्त करता है। साथ ही बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। कहा जाता है कि यम देवता ने अपनी बहन यमी (यमुना) को इसी दिन दर्शन दिया था, जो बहुत समय से उससे मिलने के लिए व्याकुल थी। अपने घर में भाई यम के आगमन पर यमुना ने बहुत प्रेम या स्नेह से उसकी आवभगत की जिस पर यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि इस दिन यदि भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जाएगी।

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भाईदूज से जुड़े रीति रिवाज
इस दिन कई प्रांतों में अलग तरीकों से ये त्योहार मनाया जाता है। कुछ स्थानों में बहनें अपने भाई की हथेली पर चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी और पैसे आदि रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कहती हैं "गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े" इसी प्रकार कहीं कहीं पर बहने हथेली पर जल डाल कर कहती हैं " सांप काटे, बाघ काटे, बिच्छू काटे जो काटे सो आज काटे" और उत्तर की ओर खत्री समाज में बहनें कहती हैं कि "नाग पूजूं नगूले पूजूं अपने वीर झंडूले पूजूं"।  इस तरह के शब्द कहने के पीछे मान्यता है कि आज के दिन अगर भयंकर पशु भाई पर आक्रमण कर भी दे तो यमराज के दूत भाई के प्राण नहीं ले जाएंगे। इसके बाद बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती हैं और फिर हथेली में कलावा बांधती हैं। भाई का मुंह मीठा करने के लिए उन्हें माखन मिस्री और अन्य मिष्ठान खिलाती हैं। कुछ स्थानों पर संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुखी दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस समय आसमान में चील उड़ती दिखना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसका अर्थ है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुना देगी।

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भाई दूज की कहानी
भारत में हर त्यौहार के साथ कहीं न कहीं लोकमान्यतायें और कथायें जुड़ी होती हैं। इस त्यौहार की भी एक पौराणिक कथा है। जिसमें यमराज अपनी बहन यमी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मिलने पहुंचते हैं। यमी अपने भाई की खूब सेवा सत्कार करती है। बहन के सत्कार से यमराज काफी प्रसन्न होते ळैं और उनसे कहतें कि बहन वरदान मांगो। भाई के ऐसा कहने पर यमी जो वास्तव में यमुना नदी हैं कहती हैं की जो भी प्राणी यमुना नदी के जल में स्नान करे वह यमपुरी न जाए। यमी की मांग को सुनकर यमराज चिंतित हो जाते हैं। यमी भाई की मनोदशा को समझकर यमराज से बोली अगर आप इस वरदान को देने में सक्षम नहीं हैं तो यह वरदान दीजिए कि आज के दिन जो भाई बहन के घर भोजन करे और मथुरा के विश्राम घाट पर यमुना के जल में स्नान करे उस व्यक्ति को यमलोक नहीं जाना पड़े। यमराज ये आर्शिवाद दे देते हैं। इस पौराणिक कथा के अनुसार ही आज भी परम्परागत तौर पर भाई बहन के घर जाकर उनके हाथों से बनाया भोजन करते हैं ताकि उनकी आयु बढ़े और यमलोक न जाना पड़े। साथ ही अपने प्रेम व स्नेह को प्रकट करते हुए बहन को आशीर्वाद देते है और उन्हें वस्त्र, आभूषण एवं अन्य उपहार देकर प्रसन्न करते हैं।

 

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