- स्वास्थ्य विभाग को संचालित करनी है खुशियों की सवारी

- पहले पीपीपी मोड पर प्राइवेट कंपनी कर रही थी संचालन

- एक केस के दिए जाते हैं 450 रुपए, विभागीय अफसरों ने किए हाथ खड़े

देहरादून,

सरकारी हॉस्पिटल में डिलीवरी के बाद जच्चा-बच्चा को घर पहुंचाने वाली खुशियों की सवारी के संचालन में 450 रुपए का पेंच फंस गया है। स्वास्थ्य विभाग ने खुशियों की सवारी संचालित करने की जिम्मेदारी पीपीपी मोड से हटाकर सीएमओ ऑफिस लेवल से करने का निर्णय लिया है। लेकिन, सीएमओ ऑफिस इसके संचालन से पहले खर्चे का गुणा-भाग करने में जुट गया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि एक केस के 450 रुपए दिये जाते हैं, इतने कम पैसे में एंबुलेंस कैसे मेंटेन होगी।

असमंजस में सीएमओ ऑफिस

खुशियों की सवारी योजना खटाई में पड़ सकती है। स्वास्थ्य विभाग ने इस योजना को पीपीपी मोड से हटाकर सीएमओ कार्यालय स्तर से संचालन का निर्णय तो ले लिया है। लेकिन बिना तैयारी के सीएमओ कार्यालय योजना के संचालन को लेकर असमंजस में है। पहले ही बिना कॉल सेंटर के योजना को चलाने में सीएमओ कार्यालय अपनी परेशानी व्यक्त कर चुका है। अब सबसे बड़ी समस्या खुशियों की सवारी के संचालन के लिए मिलने वाले बजट को लेकर है। खुशियों की सवारी में 1 केस के लिए 450 रुपए दिए जाते हैं। इसमें जच्चा बच्चा को छोड़ने के लिए एम्बुलेंस को भेजा जाता है। जिसमें दूरी यानि किमी की कोई लिमिट नहीं होती। ऐसे में दूरदराज क्षेत्रों में एम्बुलेंस भेजने को लेकर बजट मैनेज करना सीएमओ कार्यालय के लिए बड़ा चैलेंज साबित होगा। दून के सीएमओ डॉ। एसके गुप्ता ने बताया कि जहां जहां महिलाओं के प्रसव होते हैं, उन सभी हॉस्पिटल के अधिकारियों, सीएचसी और ब्लॉक इंचार्ज से रिपोर्ट मांगी गई है। अभी तक उन्हें बताया गया कि 450 रुपए में एम्बुलेंस को मेंटेन करना मुश्किल होगा। 450 रुपए में प्रति एम्बुलेंस ड्राइवर, फ्यूल और मेंटेनेंस करना है। जिसको लेकर अधिकारी असमंजस में है।

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जो बजट खुशियों की सवारी के लिए मिलना है, उसी में ड्राइवर, फ्यूल और एंबुलेंस का मेंटेनेंस करना है। इसी को लेकर ब्लॉक स्तर से रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट आते ही डीजी ऑफिस को भेज दी जाएगी।

डॉ। एसके गुप्ता, सीएमओ