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LUCKNOW : कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता। ये वो शब्द हैं जिन्हें स्मृति ईरानी ने गांधी परिवार की गढ़ मानी जाने वाली अमेठी सीट पर जीत के बाद ट्विटर पर लिखा। इन शब्दों को गढऩे के लिए स्मृति ने पिछले पांच वर्ष पहले ही अमेठी के गांवों की खाक छाननी शुरू कर दी थी, जिसके कारण ही वह राहुल गांधी से इस सीट को छीनने में कामयाब रही जबकि इस सीट से राहुल के पिता राजीव गांधी, संजय गांधी चुने जाते रहे हैं।

हार के बाद से ही शुरू की थी तैयारी
स्मृति ईरानी अमेठी से 2014 में भी चुनाव लड़ी थी, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हार के बावजूद स्मृति ने अमेठी का पीछा नहीं छोड़ा और लगातार अमेठी का दौरा करती रहीं। गांव, गलियों तक वह लोगों से मिलती, जुड़ती गईं और लोगों के दिलों में बस गईं। यही कारण रहा कि अमेठी के लोगों ने उन्हें खुलकर वोट दिए।

जुदा दिखे अंदाज
जीत के लिए प्रचार में जोर शोर से जुटीं स्मृति इरानी का अंदाज भी कुछ अलग था। 28 अप्रैल को प्रचार कर रही स्मृति को पता चला कि मुंशीगंज के पश्चिम दुआरा गांव के खेतों में आग लग गई है तो वह आग बुझाने के लिए दौड़ पड़ीं। उन्होंने गांव वालों की मदद की और हैंडपंप से पानी भरा और बाल्टी लेकर आग बुझाने तक में जुटी रहीं। लोगों के साथ घुल मिल जाने के इस अंदाज ने बता दिया था कि स्मृति अमेठी के लोगों का दिल जीतने आई हैं।

केजीएमयू का भी अहम रोल

स्मृति ईरानी की जीत में केजीएमयू का भी अहम रोल रहा है। एक संगठन भाऊराव देवरस सेवा न्यास के सहयोग के लिए केजीएमयू के डॉक्टर्स ने अमेठी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में कैंप लगाए। केजीएमयू की गाड़ी से डॉक्टर गांवों में जाकर लोगों के स्वास्थ्य की जांच करते थे। जरूरत पडऩे पर दूर इलाकों में स्थित गांवों के लोगों को केजीएमयू लाकर उनकी आंखों के मोतियाबिंद व अन्य प्रकार की सर्जरी की गई। केजीएमयू का मानना है कि यह सब सोशल आउटरीच प्रोग्राम का हिस्सा था। इससे बीजेपी व समर्थक संगठनों को अमेठी में गांव गांव में पैठ करने में आसानी हुई। केजीएमयू का यह कदम लोगो को स्मृति ईरानी के फेवर में लाने में कामयाब हुआ।

हर माह लगती थी ड्यूटी
स्मृति ईरानी के लिए राष्ट्रीय स्वयं संघ के कार्यकर्ताओं ने पिछले कई वर्षों से लगातार मेहनत की। गांव गांव में केंद्रीय योजनाओं की लोगों को जानकारी दी और लोगों को इनका लाभ भी दिलाया। इसके लिए बाकायदा संघ की ओर से लोगों की एक एक माह की ड्यूटी लगाई जाती थी। स्मृति ईरानी ने भी पिछले दो वर्षों में अमेठी में अपने दौरे बढ़ा दिए थे। इसका फायदा उन्हें प्रचंड बहुमत के रूप में मिला।

दलितों को जोडऩे उतरे प्रोफेसर
संघ से जुड़े एक प्रचारक ने बताया कि स्मृति के लिए बहुत मेहनत की गई। दलित वोटर्स को जोडऩे के लिए संघ ने बाकायदा बीएचयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी व अन्य यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसरों की अमेठी में ड्यूटी लगाई गई। लखनऊ की डॉ। भीमराव राव अंबेडकर यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले दलित छात्रों को संघ के अभियान से जोड़ा गया। इसके बाद प्रोफेसरों ने उनके घर जाकर उनके परिवार वालों को जुडऩे के लिए प्रेरित किया। उनमें भाजपा की नीतियां समझाई गईं और देश प्रेम जगाने का काम किया गया। बाद में इन छात्रों ने अपने जानने वालों, रिश्तेदारों को बीजेपी के पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए वह लोगों को इकट्ठा करते और फिर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लोगों को आकर समझाते थे। यह सिलसिला लगातार जारी रहा। ऐसे ही अन्य जातियों को जोडऩे के लिए विशेष अभियान चलाए गए और इसके लिए संघ से जुड़े प्रबुद्धजनों को लगाया गया।