GORAKHPUR: अब मतदान का महापर्व पहले जैसा गुलजार नहीं हो रहा है। सभी पार्टियां बड़ी-बड़ी रैलियां, रोड शो और सभा द्वारा चुनाव प्रचार कर रही हैं। जबकि, पहले लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी पार्टियों से लेकर आम लोग भी उत्साहित रहते थे। कार्यकर्ताओं की टोली गली-गली घूमकर अपने प्रत्याशी के लिए प्रचार करती थी। उनके समर्थन में नारे लगाते थे। लोग भी उनका समर्थन करते थे। हर घर की छतों पर पार्टियों के झंडे टंगे रहते थे। दीवारों पर पोस्टर चिपकाएं जाते थे। चौक-चौराहों पर बड़े-बड़े बैनर लगाए जाते थे। पंपलेट बांटे जाते थे। गाडि़यों पर लाउडस्पीकर से प्रचार होते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। गोरखपुर में कही भी न तो झंडे दिख रहे हैं और न ही पोस्टर बैनर। गोरखपुराइट्स का कहना है कि अब पहले वाली बात नहीं रह गई है। लोकसभा चुनाव को लेकर कही भी शोर नहीं हो रहा है।

सख्ती ने बदल दिया तरीका

लोकसभा चुनाव के मैदान में आठ दिन शेष रह गया है। लेकिन चुनाव प्रचार अभियान अभी तक रफ्तार नहीं पकड़ सका है। लोगों का कहना है कि तीन, चार दशक पहले तक तो मतदान की तिथि और उम्मीदवारी की घोषणा के तत्काल बाद से ही जीप पर माइक बांधकर उम्मीदवार विशेष के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रचार से वातावरण गुलजार रहता था। माइक बंधे ऐसे वाहनों से समर्थक उम्मीदवार व उसकी पार्टी और चुनाव चिह्न पर वोट मांगने का शोर गली-गली तक होता था। निर्दलीय उम्मीदवार भी इसमें पीछे नहीं रहते थे। उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करने की अपील संबंधी पोस्टर बैनर व दीवार लेखन भी अब अतीत की बात हो चुकी है। इधर, कुछ वर्षो से चुनाव आयोग की सख्ती के नियम प्रभावी होने का यह असर है। इसकी वजह से चुनाव खर्च में कमी भी आई है।

घर-घर दस्तक देते थे कार्यकर्ता

पहले वोटिंग पैर्टन बड़ा आसान होता था। वैलेट पेपर पर उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न रहता था, जो पढे़ लिखे मतदाता होते थे। वे नाम और चुनाव चिन्ह देखकर अपना वोट दे देते थे। अनपढ़ लोग अगर नाम नहीं पढ़ पाते थे। तो वे चुनाव चिह्न पर बहुत आसानी से मुहर लगा आते थे। अब परिस्थितियां बदल चुकी है। आज कल ईवीएम का प्रचलन है। पहले चुनाव में उम्मीदवार के वर्कर घर-घर दस्तक देते थे। अपने चुनाव चिह्न व मतदान क्रम संख्या की पर्ची दिया करते थे। अब यह परंपरा काफी कम हो गई है। अब रोड शो और जनसंपर्क अधिक किया जाता है।

- पोस्टर कार्ड

- लाउडस्पीकर

- झंडे, बैनर, पोस्टर

- बिल्ले और बैच

- दीवार लेखन, छपाई

- मोबाइल एप

- डोर टू डोर

- बैलगाड़ी से लेकर रिक्शे तक का उपयोग

- नुक्कड़

- मोबाइल संदेश

- मुखौटे का जोर