-विपरीत हालातों में भी प्रभु श्रीकृष्ण की तरह आगे बढ़कर दिखाई राह और संवारा भविष्य

allahabad@inext.co.in

ALLAHABAD: जीवन में बहुत सी कठिनाइयां आती हैं जब सपने टूट जाते हैं और हम नाउम्मीद हो जाते हैं. ऐसे में श्रीकृष्ण की तरह सच्चा पथ प्रदर्शक हमारे जीवन को नई राह दिखाता है. वह हमारे जीवन का श्रीकृष्ण होता है. आज हम ऐसे ही अर्जुन सरीखे दो व्यक्तित्व की बात कर रहे हैं जिनको श्रीकृष्ण रूपी अपनों ने जीवन में सफलता की राह दिखाने का काम किया है. इतना ही नहीं राह की सारी मुश्किलों को खुद आगे बढ़कर चूमते हुए एक-एक कदम पर विपरीत हालातों में अपने बच्चों के साथ चट्टान के साथ अडिग भी हैं.

कहानी : एक

दीपक की तरह लौ बने हैं डॉक्टर कुलदीप

ALLAHABAD: इलाहाबाद में डिप्टी वेटनरी ऑफिसर के पद पर तैनात डॉ. कुलदीप सिंह वर्ष दो हजार से सेरेब्रल पाल्सी से ग्रसित अपने बेटे उद्देश्य सिंह की देखभाल में रोजाना पंद्रह घंटा देते हैं. बचे हुए टाइम में ड्यूटी भी मुस्तैदी के साथ करते हैं. पैदा होते ही बेटा इस बीमारी से ग्रसित हो गया. शुरू के पांच साल तक डॉ. सिंह और उनकी पत्नी हेमलता सिंह साए की तरह साथ रहते थे. बेटे के सभी रूटीन वर्क को खुशी से पूरा करते थे. उसके बाद जब स्कूल में दाखिले की बारी आई तो कई स्कूलों ने ऐसी बीमारी वाले बच्चे को दाखिला देने से मना कर दिया.

दो साल तक मां ने स्कूल में भी देखभाल

आधा दर्जन स्कूलों इंकार के बाद बाल भारती स्कूल एंड कॉलेज में प्रिंसिपल की मदद से एलकेजी में दाखिला मिला. दो साल तक लगातार मां हेमलता सिंह स्कूल जाती थी. क्लास के बाहर बैठकर उसकी मॉनिटरिंग करती थी और पेंसिल पकड़ने से लेकर हिन्दी वर्णमाला तैयार करवाती थी. लेकिन बेटी के जन्म से पहले स्कूल जाना छोड़ा तो पिता ने जिम्मेदारी संभाली और वर्तमान समय तक उसका निर्वहन करते आ रहे हैं.

दिखाई राह तो मिली जज्बा, जीते पुरस्कार

माता-पिता की देखभाल ने उद्देश्य के मन में सक्सेज की लगन पैदा कर दी. वह आईएसएस बनने का ख्वाब पाले हुए है. डॉ. सिंह ने बताया कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों उद्देश्य को बेस्ट क्रिएटिव चाइल्ड का अवॉर्ड, केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को हाथों नेशनल अवॉर्ड बालश्री और यूपी सरकार की ओर से उत्कृष्ट रोल मॉडल का अवॉर्ड हासिल हो चुका है. उन्होंने बताया कि इसी साल दिल्ली यूनिवर्सिटी की दूसरी कटऑफ में उसे हिन्दू कॉलेज में बीए ऑनर्स राजनीतिशास्त्र में दाखिला मिला है. इसमें उद्देश्य के आईएएस बनकर समाज में सेरेबल पाल्सी से ग्रसित बच्चों के लिए मदद करने का सपना छुपा हुआ है.

---------------

कहानी : दो

पिता ने छोड़ा तो मां बनीं सारथी

ALLAHABAD: 19 दिसम्बर 1989 को जीनत जहां ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी पैदा होने के तीन दिन भीतर उनके शौहर ने अबोध बालिका और अपनी पत्नी को छोड़ दिया. सिर्फ इतना ही नहीं, घर से भी निकाल दिया. ऐसी विपरीत स्थिति में जीनत जहां ने बेटी को गले लगाया और उसका भविष्य बनाने के लिए नैनी स्थित एडीए कॉलोनी में माता-पिता के घर आ गई. वहां पंद्रह साल तक बेटी को लेकर रहीं, लेकिन कभी भी किसी का सहयोग नहीं मिला. बेटी का सारथी बनकर उसकी जिंदगी संवारने के लिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाया और सिलाई का भी काम किया.

गीत गुनगुना कर बनी जागरण की शान

जीनत जहां ने बताया कि बेटी सात साल की उम्र से ही गाना गुनगुनाया करती थी. उसकी आवाज बहुत अच्छी थी. जब उसका दाखिला नौवीं में क्रास्थवेट ग‌र्ल्स इंटर कॉलेज में कराया तो उसके लिए कीडगंज एरिया में किराए का कमरा लिया. कमरे पर ही आठवीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. पढ़ाई के दौरान मोहल्ले में नवरात्रि के दौरान जागरण में इशरत जहां ने देवी गीत गाना शुरू किया तो जगह-जगह पर उसे गायिकी के लिए आमंत्रित किया जाने लगा.

शूरवीर ने लगाया सपनों को पंख

बेटी को पा‌र्श्व गायिका बनने का सपना था इसीलिए दिल्ली व लखनऊ में महुआ चैनल के शूरवीर प्रतियोगिता के लिए 2014 में ऑडिशन के लिए लेकर गई. मां की सीख का असर रहा कि इशरत 2016 में दर्जनों प्रतिभागियों के बीच शूरवीर की विजेता बनी. इसके अलावा राइजिंग स्टार प्रतियोगिता के अंतिम बारह प्रतियोगियों में स्थान भी बनाया था. जीनत जहां ने बताया कि 29 साल में एक बार भी उसके पिता ने पलट नहीं देखा. मुझे इसका अफसोस भी नहीं है. लेकिन मुझे अपनी बिटिया को उसका मुकाम हासिल कराना ही है.