माघ मास में स्नान का बेहद महत्व है। इस मास से संगम में स्नान से काफी पुण्य मिलता है। अगर आप महाकुंभ में शामिल होने के लिए जा रहे हैं तो प्रयाग में अलोपशंकरी माता के दर्शन करना न भूलें। माता के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

अलोपशंकरी नाम का कारण

प्रयाग में ललिता पीठ के रूप में सर्वाधिक मान्यता अलोपशंकरी देवी को प्राप्त है। यह शक्तिपीठ संगम से पश्चिम और अक्षयवट के वायव्य कोण उत्तर पश्चिम में स्थित है। दुर्गा सरस्वती कवच के अनुसार, करांगुल्यौ शंकरी यानी यहां पर सती के हाथ की अंगुलियां गिरी थी। सती के हाथ की गिरी अंगुलियों से अलोपशंकरी व भैरव प्रकट हुए थे।

कहते हैं कि देवी का जो अंग गिरा था वह अलोप हो गया था, इसलिए यहां देवी को अलोपशंकरी कहा जाता है। यह मंदिर माता के 52 शक्तिपीठों में से एक है।

मंदिर में नहीं है कोई मूर्ति 

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मंदिर के अंदर देवी की कोई मूर्ति नहीं है। वहां एक चबूतरे पर पालना है, श्रद्धालु उस पालने की ही पूजा करते हैं और माता से मन्नते मांगते हैं।

इस मंदिर से जुड़ी एक मान्यता यह है कि जो लोग अपनी कलाई में रक्षासूत्र बांधकर माता से जो कुछ भी मांगते हैं, वह उनको मिलता है। जब तक वे अपनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधे रहते हैं तब तक माता उस व्यक्ति की रक्षा करती हैं।    

माता के इस मंदिर में लाल मिर्च से होता है हवन, हर मुराद होती है पूरी      

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