इलाहाबाद में कई लोग लगातार कई साल से करते हैं आ रहे हैं ब्लड डोनेशन

लोगों को देते हैं ब्लड डोनेशन का मैसेज, फैला रहे हैं जागरुकता

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ALLAHABAD: कहते हैं जीना-मरना भगवान के हाथ में है. लेकिन हम इंसान होकर भी ऐसा कुछ कर सकते हैं, जो किसी की जान बचाने में मददगार हो सकता है. ब्लड डोनेशन ऐसा ही एक जज्बा है, जो किसी की जान बचा सकता है. शहर में ऐसे कई लोग हैं जो बरसों से यह नेक काम कर रहे हैं. 14 जून को ब्लड डोनर डे के मौके पर पढि़ए शहर के कुछ ऐसे ब्लड डोनर्स की कहानी..

मामू की जान बचाने के बाद हुआ अहसास

नाम: मो. मेहंदी नकवी

नंबर ऑफ ब्लड डोनेशन: 105

1988 में कैंसर से पीडि़त मामू को ब्लड देने के बाद नकवी को अहसास हुआ कि ब्लड डोनेशन से किसी की जान बचाई जा सकती है. इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विवि में यूनिवर्सिटी वॉलिंटयरी ब्लड डोनेशन फोरम की स्थापना की और रैलियों का आयोजन किया. ब्लड डोनेशन में सेंचुरी मार चुके नकवी पेशे से आप्टोमेट्रिस्ट हैं और दूसरों को रक्तदान के लिए प्रेरित करते रहते हैं.

नही चाहिए सम्मान, बस युवा आएं आगे

नाम: अमित बनर्जी

नंबर ऑफ डोनेशन: 86

कई वर्षो से रक्तदान कर रहे अमित कहते हैं कि उन्हें सम्मान नहीं चाहिए. अब तो बस युवाओं में रक्तदान के प्रति अलख जगाना है. वह आगे आएं यही हम जैसों का सम्मान होगा. वह कहते हैं एचआईवी पीडि़त और सेफ डोनेशन के लिए 1990 से काम कर रहे हैं. हालांकि, उन्हें रक्तदान के प्रति सरकारी रवैये से नाराजगी है.

एक सपना जो रह गया अधूरा

नाम: प्रो. प्रशांत घोष

नंबर ऑफ डोनेशन: 18

इलाहाबाद विवि के इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट के प्रो. घोष को एक गंभीर बीमारी की वजह से अपना रक्तदान के अभियान को रोकना पड़ा. वह कहते हैं उनका एक सपना पूरा नहहीं हो सका. वह चाहते थे कि यूनिवर्सिटी में एडमिशन के समय प्रत्येक छात्र का ब्लड ग्रुप जांचकर उसे आई कार्ड में मेंशन किया जाए. लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. हालांकि आई कार्ड में ब्लड ग्रुप का कॉलम उनके इस प्रयास की देन ही है.

शुरू हुआ तो फिर नहीं थमा सिलसिला

नाम: संजय साहू

नंबर ऑफ डोनेशन: 58

इरादतगंज घूरपुर के रहने वाले संजय ने 1999 में पहली बार अपनी पत्नी को ब्लड दिया था. इसके बाद उनको रक्तदान का जुनून सा चढ़ गया. राह चलते कोई घायल दिखता तो जरूरत पड़ने पर वह ब्लड बैंक पहुंच जाते थे. वह कहते हैं कि एक यूनिट ब्लड से चार लोगों का जीवन बचाया जा सकता है तो फिर पीछे क्यों रहे. ब्लड देने से बॉडी को कोई नुकसान भी नही पहुंचता.

जीवन में रक्तदान से बढ़कर कुछ नहीं

नाम: राजीव मिश्रा

नंबर ऑफ डोनेशन: 47

बलिया के रहने वाले रिसर्च स्कॉलर राजीव कहते हैं कि आपका दिया ब्लड किसी की जान बचा सकता है. अगर किसी को ब्लड की जरूरत है तो बिना सोचे रक्तदान करना चाहिए. कहते हैं कि आयुष्मान येाजना के तहत गरीबों को कम से कम दो यूनिट ब्लड मुहैया कराया जाए. एक जिले से दूसरे जिले में ब्लड प्रदान किया जाना चाहिए. राजीव को हाल ही में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की ओर से रक्तदान संबंधी प्रशस्ति पत्र भेजा गया है.

इनकी वजह से मनाया जाता है 14 जून

ऑस्ट्रियाई जीव विज्ञानी और भौतिकीविद नोबल पुरस्कार विजेता कार्ल लेंडस्टाइनर का जन्म 14 जून को हुआ था. उन्होंने खून में अग्गुल्युटिनन की मौजूदगी के आधार पर रक्त का अलग-अलग समूहों में वर्गीकरण कर अहम योगदान दिया था. यही कारण है कि डब्ल्यूएचओ ने रक्तदाता दिवस के लिए 14 जून का चयन किया.