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LUCKNOW : वाजपेयी साहब, पंडित जी जैसे कई नाम से पुकारे जाते थे पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी। चौक की गलियों में उनकी यादें आज भी उतनी ही ताजी हैं, जितना उनका शानदार व्यक्तिव था। अटल जी लखनऊ के सांसद बनने से पहले से ही लखनऊ की गलियों में बैठकें लगाते थे, पुराने शहर में घूमते थे, और अपनी मनपसंद जगहों पर बैठकर अपनी कविताओं को लिखते थे। सांसद और फिर प्रधानमंत्री बनने के साथ भी लखनऊ से उनका नाता खत्म नहीं हुआ। पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद वह लाप्लास में लोगों से मिलने भी आए थे जहां वह रहा करते थे।
 
पुराने लखनऊ से अटूट नाता
अटल बिहारी बाजपेयी को पुराना लखनऊ सबसे अधिक पसंद था। जहां गलियों में घूम-घूम कर वो लोगों से मिलते थे और बातें किया करते थे। अटल जी के एक पुराने मित्र और भाजपा के नेता ने बताया कि आजकल की तरह पहले लखनऊ नहीं था। अब तो सब बदल चुका है। उनको पुराना लखनऊ ज्यादा पसंद था। वो हजरतगंज में कभी-कभार ही रुकते थे। जहां अब लोहिया पार्क है पहले उसी के सामने की तरफ एक चाय की दुकान थी जहां एक टूटी बेंच थी। जहां पर बैठकर कई बड़े नेता अटल जी के साथ बैठकर चाय की चुस्कियों संग कई मामलों पर चर्चा करते थे। गोमती किनारे बने कुडिय़ा घाट पर अक्सर वो जाकर बैठते थे और कुछ न कुछ गुनगुनाया करते थे, वहां वो घंटों बैठे रहते थे। अटल जी गोमती की सफाई को लेकर हमेशा परेशान रहते थे वो कहते थे कि अगर ये प्रदूषित हो गई तो लखनऊ के लोग पानी को तरसेंगे।

अक्सर पैदल ही चले जाते थे हजरतगंज से चौक
अटल जी खाने पीने के बहुत शौकीन थे। चौक चौराहे पर मिलने वाली लस्सी, ठंडाई उन्हें बेहद पसंद थी। जिसके चलते वह अक्सर पैदल ही हजरतगंज से चौक चले जाते थे। शाम को गरम दूध में मलाई अलग से डलवाकर पीते थे। चौक स्टेडियम के पास में ही एक ठेला लगाता था उसके पास ही चाट खाने जाते थे, जिसमे दही और इमली की चटनी में बुकनू अलग से डलवाकर चटपटा बनवाते थे। चाट के शौकीन अटल जी के कई और ठिकाने भी थे जहां वह रोज चाट का स्वाद लेने जाया करते थे। जिसमें चौक के स्टेडियम के पास, गनेशगंज में पुराना आरटीओ के पास प्रमुख थे। चौक में उस समय राजा की ठंडाई मशहूर थी जिसे रानाधर पंडित जी दुकान लगाते थे, उन्हीं के यहां वो ज्यादातर बैठकर लस्सी और ठंडाई पीते थे। अब उनके परिवार के लोग कही और बस गए हैं, दुकान भी लगाते हैं पर पंडित जी की बात कुछ और थी।

चाय की चुस्कियों के साथ करते थे चर्चा
लस्सी, ठंडाई और चाट के शौकीन एपी सेन रोड था उनका 'अड्डा' जनसंघ बनने से पहले अटल जी ने पत्रकारिता के समय एपी सेन रोड पर एक दोस्त के यहां बैठने का ठिकाना बना रखा था, जहां आज प्रो राजेन्द्र सिंह 'रज्जू भैया' के नाम से बिल्डिंग बन गई है। वहां पर उसके सभी साथी लगभग रोज पहुंचते थे और राजनीतिक और सामजिक मुद्दों पर बात होती थी।

जब मोची के दुकान में बैठ गए
अटल जी के एक मित्र के अनुसार अटल जी कुछ जगहों पर ऐसे बैठते थे, जैसे उनसे उनका पुराना रिश्ता हो वो किसी अनजान व्यक्ति तो ये एहसास नहीं होने देते थे कि वो पहली बार मिला है। ऐसे में एक बार वो चौक में एक मोची के यहां ही बैठ गए और जब तक उसने अटल जी की सैंडल सही की तबतक उसे कविताएं सुनाते रहे।

चाय की दुकान को बना देते मंच
अटल जी चाय, लस्सी की दुकानों को ही राजनीतिक मंच बना देते थे। जहां देश-प्रदेश और विदेश की बातें किया करते थे और लोगों को अपनी समझ के साथ कविताओं के माध्यम से हर बात सुनाते थे। अमीनाबाद में कई ऐसे 'अड्डे' थे जहां वो अपनी बातें लोगों तक पहुंचाते रहे। अमीनाबाद में झंडे वाला पार्क में पहले एक नीम का पेड़ था वहीं ज्यादातर बैठते थे। लाटूश रोड पर उन्होंने कोई एक दोस्त बना रखा था जो कि हारमोनियम बनाता था और बजाता भी था उसको सुनने वो अक्सर वहां जाया करते थे जब कुछ उदास होते थे।

तेज बुखार फिर भी वादा निभाया
एक बार अटल जी को बहुत तेज बुखार था। उनको दिल्ली में डॉक्टर ने कहीं भी न जानें की सलाह दी पर वो नहीं माने उन्होंने कहा कि मुझे किसी ने बुलाया है मैं जरूर जाऊंगा और वो नहीं मानें लखनऊ के कुडिय़ा घाट के कार्यक्रम में शामिल होने आए। कार्यक्रम खत्म होने के बाद उनमें इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वो ठीक से कुछ देर खड़े हो पाएं, लेकिन उस समय एक पत्रकार गायत्री जोशी ने कहा कि मुझे आपका 5 मिनट का समय चाहिए एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए यहीं पर और अटल जी पहले तो मना किया फिर उसकी उत्सुकता देख कर हां कर दी और उसकी डाक्यूमेंट्री बनवाई, लेकिन उसे ये बताया तक नहीं कि उन्हें तेज बुखार है।

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