DEHRADUN: मदर्स डे पर आपको मां और ममता से जुड़ी कुछ ऐसी कहानियां बताते हैं, जो मिसाल बन गई। ये ऐसी मां हैं, जिन्होंने भले ही अपनी कोख से बच्चों को जन्म नहीं दिया, लेकिन बच्चों के लिए उनका प्यार और संघर्ष जन्म देने वाली मां से भी बढ़कर है। किसी ने रेप पीडि़ता की ठुकराई गई बेटी को अपनाया, तो कोई अपने अंश से सरोगेट मदर के जरिए पैदा हुए बच्चे को पाने के लिए चार वर्ष तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ती रही, और आखिर बेटे को हासिल करने पर ही दम लिया। एक महिला अफसर ने तो अनाथ और बेसहारा बच्चों पर प्यार लुटाने के लिए खुद शादी नहीं की। कई बाल आश्रम अडॉप्ट कर वहां के सैकड़ों बच्चों पर इतना प्यार लुटाया कि सब उन्हें मां बुलाते हैं।

ममता की कहानी-1

रेप पीड़िता ने बेटी ठुकराई,बाल आयोग की चेयरपर्सन ने अपनाई: बाल आयोग की अध्यक्ष उषा नेगी ममता की मिसाल है। पांच माह पहले एक रेप पीडि़ता युवती समाज में बदनामी और बच्ची के लालल-पालन में असमर्थता जताकर अपनी तीन दिन की बेटी को बाल आयोग में छोड़ गई। सगी मां ने जिस बच्ची को छोड़ दिया्र, उस तीन दिन की नवजात को बाल आयोग की अध्यक्ष अपने घर ले आई। लालन-पालन में सहायता के लिए कुछ दिन अपनी विवाहित बेटी और नातिन को भी अपने घर बुलाया। उनकी ममतामयी देखरेख में अब वह बिटिया पांच माह की हो गई है, बाल अधिकारों की रक्षा के लिए उषा नेगी की दौड-धूप भी किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद सुबह-शाम वे खुद मासूम बच्ची की देखभाल करती हैं। यहां तक कि बच्ची रात को सोती भी उनकी गोद में है। वे इस बच्ची का फ्यूचर प्लान करने में भी जुटी हैं। कोई ज्वॉइंट फैमिली अगर इस मासूम को अडॉप्ट करना चाहे तो वे उसके अच्छे भविष्य के लिए उसे सौंपने पर भी विचार कर रही हैं। राज्य आंदोलनकारी रही उषा नेगी ने 16 वर्ष पहले भी होटल में बाल मजदूरी करने वाले एक बच्चे को वहां से मुक्त कराया और खुद पाल-पोसकर बड़ा किया है। अब वह भी शादीशुदा है और नौकरी करता है।

ममता की कहानी-2

सैकड़ों बच्चों की मां है ये महिला अफसर: सहकारिता विभाग की सचिव रमिंद्री मंद्रवाल ने शादी तो नहीं कि फिर भी उनके सैकड़ों बच्चे हैं। चौंकिए नहीं, दरअसल रमिंद्री मंदरवाल को बच्चों से इतना लगाव है कि उन्होंने प्रदेश के कुछ बाल आश्रमों को ही अडॉप्ट कर लिया। बरसों से वहां रह रहे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, फ्यूचर के लिए वे हर समय चिंतित रहती है। अपनी नौकरी के बाद जब भी उन्हें समय मिलता है, वे पहुंच जाती है बाल आश्रमों में रह रहे बच्चों के पास। इन आश्रमों में कई बच्चे तो अब बड़े होकर खुद का परिवार बसा चुके हैं, नौकरी कर रहे हैं, कई अलग अलग शहरों में जा बसे हैं, लेकिन रमिंद्री मंदरवाल को वे 'मां' ही पुकारते हैं। रमिंद्री इतनी सरल और सहज ह्दय वाली महिला हैं कि उन्हें पता भी लग जाए कोई बच्चा परेशानी में है तो बेचैन हो जाती है। वे काफी समय समाज कल्याण विभाग में सचिव रही, उस दौरान उनका बिन मां-बाप वाले बच्चों के प्रति प्रेम और बढ़ गया। सैकड़ों बच्चों की इस मां का व्यक्तित्व भी ममतामयी है, वे बच्चों और यहां तक कि युवाओं को भी बेटा-बेटी कहकर पुकारती हैं।

ममता की कहानी-3

बेटे को पाने के लिए 4 वर्ष तक हर पल जागी यह मां: यह कहानी ऐसी मां की है,जिसने अपनी कोख से तो बच्चों को जन्म नहीं दिया, लेकिन सरोगेसी के जरिए पैदा हुए दो बच्चों में से एक को हड़प लिए जाने पर चार वर्ष तक बड़ी लड़ाई लड़ी। पेशे से होम्योपैथिक फार्मासिस्ट यह मां ऋषिकेश की रहने वाली रंजना रावत हैं। उनके अंश से सरोगेट मदर ने गर्भधारण किया। गर्भ में उसके जुड़वा बच्चे थे। सरोगेट मदर को लालच आ गया और वह प्रसव से पहले ही बिना बताए फरार हो गई। कुछ माह बाद सरोगेट मदर बचे हुए पैसे लेने एक बच्चा लेकर वापस लौटी.बच्चा अंजना को सौंपते समय कहा कि दूसरा बच्चा मृत पैदा हुआ था। रंजना को यकीन नहीं हुआ, उसे दिन रात अपने दूसरे बच्चे की ंिचंता सताती रही। सरोगेट मदर मेरठ में रहती थी। देहरादून, से लेकर मेरठ तक वे अपने दूसरे बच्चे का पता लगाने के लिए दो वर्ष तक चक्कर लगाती रही। सरोगेट मदर के आसपास वाले सैकड़ों लोगों से लगातार संपर्क करती रही,तो उसे पता चला कि लोगों ने सरोगेट मदर के पास लोगों ने दूसरा बच्चा देखा है। सरोगेट मदर ने फिर इनकार कर दिया और लापता हो गई। अब तो इस मां की आंखों से मानों नींद ही उड़ गई। क्या चौकी, क्या थाना, पुलिस के सीनियर अफसराें से लेकर सीएम तक अपना दूसरा बच्चा दिलाने के लिए गुहार लगाई। तीन वर्ष बाद सीएम ने आदेश किए तब ऋषिकेश थाने में बच्चा हड़पने की एफआईआर दर्ज हो पायी। पुलिस ने सरोगेट मदर को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उसने बच्चा छिपाने के इरादे से किसी रिश्तेदार को दे दिया। मां फिर दिन रात बच्चे की तलाश के लिए पुलिस के चक्कर काटती रही। आखिरकार दो माह पहले पुलिस ने उसका दूसरा बेटा भी सकुशल बरामद कर लिया। करीब साढ़े चार वर्ष के संघर्ष के बाद 19 अप्रैल को कोर्ट ने बच्चे का डीएनए रंजना रावत से मैच होने पर उसे सौंप दिया और ममता के संर्घष की जीत हुई।