-मसूरी गोलीकांठ की 23वीं वर्षगांठ आज, शहीद आंदोलनकारियों को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे आंदोलनकारी

DEHRADUN: राज्य आंदोलन के दौरान मसूरी गोलीकांड की आज ख्फ्वीं वर्षगांठ है. हर कोई राज्य प्राप्ति के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले शहीद राज्य आंदोलनकारियों को नमन कर रहा है. लेकिन यकीन मानिए आज का वह दिन ख् सितंबर क्99ब् की सुबह का वह मंजर आंखों के सामने आते ही रूह कांप उठती है. जब झूलाघर स्थित संयुक्त संघर्ष समिति के कार्यालय में तत्कालीन यूपी सरकार के हुक्मरानों के आदेशों पर पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर अचानक गोलियां बरसानी शुरू कर दी थी. फिर क्या था चंद मिनटों में राज्य की मांग कर रहे म् आंदोलनकारी जमीन पर पड़े मिले. चारों तरफ कोहराम मच गया और कुछ ही पल में देश की आजादी के बाद पहली बार मसूरी में क‌र्फ्यू लगा ि1दया गया.

श्रद्धांजलि देने को एकत्रित हुए थे आंदोलनकारी

गोलीकांड के बाद पुलिस व पीएसी के जवानों ने घरों से आंदोलनकारियों को उठाना शुरू किया. जब आंदोलनकारियों के सामने पुलिस व पीएसी के जवानों की नहीं चली तो उनके खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें एक-एक करके जेलों में ठूंसना शुरू कर दिया. दरअसल, एक सितंबर को खटीमा गोलीकांड में मारे गये आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि देने संयुक्त संघर्ष समिति कार्यालय में मसूरी के आंदोलनकारी एकत्रित हुए थे. लेकिन इस दौरान वहां पर पुलिस व पीएसी अपना कब्जा कर चुकी थी और संयुक्त संघर्ष समिति कार्यालय पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था. क्रमिक अनशन पर बैठक पांचों आंदोलनकारियों को पुलिस गिरफ्तार कर देहरादून भेज चुकी थी. क्रमिक अनशन पर बैठे आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने के विरोध में अन्य आंदोलनकारी संयुक्त संघर्ष समिति कार्यालय में शांतिपूर्ण धरने पर बैठे तो पुलिस व पीएसी ने बिना चेतावनी दिए गोलियां दागनी शुरू कर दी. इसमें दो महिलाओं बेलमती चौहान व हंसा धनई सहित छह लोग शहीद हुए और दर्जनों घायल हो गए. आरोप लगे कि गिरफ्तार किए गये आंदोलनकारियों को यातनाएं देकर प्रताडि़त किया गया था. अनेकों के खिलाफ सीबीआई कोर्ट में मुकदमे दर्ज किए गये, जिनको कई सालों तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े. मूसरी गोलीकांड की ख्फ्वीं वर्षगांठ पर राज्य शहादत देने वाले आंदेालनकारियों को नमन कर रहा है. लेकिन अलग राज्य की मांग करने वालों को उम्मीद थी कि अलग राज्य होगा, सुशासन मिलेगा और पलायन रुकेगा. लेकिन राज्य गठन के क्7 सालों बाद भी राज्य आंदोलनकारी ठगा-सा महसूस कर रहे हैं.