...और नहीं खुल पाई बुक शॉप
सिटी में थिएटर एंड अदर कल्चरल एक्टिविटीज को नया आयाम दे चुके डॉ. बृजेश्वर सिंह खुद तो एक अच्छे रीडर हैं और
इसके साथ ही वह बरेली के यूथ में रीडिंग हैबिट कल्टीवेट करने के लिए विंडरमियर में रीड रिहर्सल शुरू कर रहे हैं. इसक
ा आयोजन वीकली किया जाएगा. इसके तहत किसी भी व्यक्ति को एक स्टोरी सेलेक्ट करके उसे कई बार पढऩा होगा
और इसके बाद उसे ऑडीटोरियम में भाव-भंगिमाओं के साथ सुनाना होगा. वहीं अगली प्लानिंग की बात करते हुए डॉ.
सिंह ने बताया कि वह बुक क्लब फॉर्म करने के बारे में प्लान कर रहे हैं. इस सबके बीच उन्होंने बताया जब उन्होंने
विंडरमियर में कॉफी शॉप ओपन की थी तब एक बुक शॉप का भी प्लान किया था. पर जब इसके लिए उन्होंने एक सर्वे
क जरिए बरेलियंस के रिएक्शंस लिये तो वह काफी निराशाजनक थे. ऐसे में, उन्हें अपना प्लान बदलना पड़ा.

...ताकि जुड़ सके youth
जब आने वाली पीढ़ी में रीडिंग हैबिट ही खत्म हो रही हो, ऐसे में नई पीढ़ी को रिलीजियस बुक्स से रूबरू कराना एक बड़ा
चैलेंज बनकर सामने खड़ा है. ऐसे में, कॉन्वेंट एजुकेटेड यूथ को रिलीजियस बुक्स के प्रति अट्रैक्ट करने के लिए अब
इनका इंग्लिश वर्जन भी आसानी से मौजूद है. हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, सत्यनारायण की कथा की ई-बुक्स को भी
ई-शॉपिंग के जरिए बॉय किया जा रहा है.  

Updated नहीं हैं लाइब्रेरी
यूं तो सिटी में तमाम लाइब्रेरीज हैं. पर इनमें से कोई भी लाइब्रेरी अपडेटेड नहीं है. यहां तक कि तमाम लाइब्रेरीज में तो
पढऩे के लिए बुक्स ही नहीं हैं. दरअसल, ये लाइब्रेरीज अब केवल न्यूज पेपर और मैग्जीन पढऩे के लिए रीडिंग रूम बन
चुकी हैं. सिटी की पुरानी लाइब्रेरीज में से एक नावेल्टी पर बनी नगर निगम की लाइब्रेरी व जिला पंचायत के सामने बनी
राजकीय लाइब्रेरी है. पर नगर निगम की लाइब्रेरी में तो बुक्स हैं ही नहीं, और राजकीय लाइब्रेरी बिल्कुल भी अपडेट नहीं
है. कैंट में बनी युगवीणा लाइब्रेरी भी बनने के बाद कुछ साल तो अपडेट रही पर अब उसकी स्थिति भी ऐसी ही हो चुकी
है.

बीसीबी की लाइब्रेरी है oldest

बीसीबी की लाइब्रेरी सबसे पुरानी है, पर यहां के रेयर बुक सेक्शन की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है. खास बात यह है कि
यहां रखी कुछ रेयर बुक्स गायब भी हो चुकी हैं. कॉलेज के संस्कृत डिपार्टमेंट के पहले को-ऑर्डिनेटर डॉ. भोलानाथ शर्मा ने
मूल जर्मन लैंग्वेज में लिखी बुक फाउस्ट का हिंदी रूपांतरण किया था. यह उनकी कॉपीराइट बुक थी. पर अब यह लाइब्रेरी
में मौजूद नहीं है. ना ही लाइब्रेरी के रिकार्ड में इसके इश्यू होने का जिक्र है. ना ही लाइब्रेरियन वीडी यादव को इसकी
जानकारी है. वहीं डॉ. शर्मा की ही लिखी गई बुक अरस्तु की राजनीति भी लाइब्रेरी से नदारद है.

You can read e-books
यह नया अंदाज है ई-बुक्स का. अमेजन कंपनी द्वारा तैयार किया गया ई-बुक्स किंडल एक ऐसा गैजेट है, जहां पर
देश-दुनिया की सभी फेमस बुक्स को लोग आसानी से पढ़ रहे हैं.


What is kindle

अमेजन कंपनी द्वारा तैयार किया गया ई-बुक किंडल एक ऐसा गैजेट्स है. जिसकी मदद से आप कुछ ही सेकंड में किसी
भी बुक्स को डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं. किंडल एक तिहाई इंच से भी पतली एक मैगजीन की तरह है. जिसका वेट
एक आम बुक्स से कामी कम है. किंडल की सबसे बड़ी खूबी इसका हमेशा ऑन लाइन रहना. इसके लिए न तो कोई
इंटरनेट कनेक्शन की जरुरत पड़ती है. यह थ्री जी टेक्नीक से हमेशा सर्वर से जुड़ा रहता है. आप जो भी बुक पढऩा चाहते
हैं बस उसे सेलेक्ट करना पड़ता है. एक मिनट से भी कम समय में यह डाउनलोड हो जाती है. इसकी सबसे बड़ी जो खूबी
है वह यह है कि इसे आप बुक्स और मैगजीन की तरह पढ़ सकते हैं. इसे एक बार चार्ज करने के बाद हफ्ते तक इसमें
बुक्स पढ़ सकते हैं. किंडल में पांच लाख न्यू बुक्स के अलावा डेली इसके सर्वर में बुक्स, मैगजीन और न्यूज पेपर्स जुड़
रहे हैं. किंडल को अमेजन कंपनी ने बनाया है. अमेजन पहले इंटरनेट पर बुक्स बेचने वाली नामी कंपनी थी. किंडल को
उसने ई बुक्स रीडर्स के तौर पर लांच किया था. 290 ग्राम की डिवाइस के तीन वर्जन हैं.

कितनी है कीमत
इंडिया में भी किंडल स्टोर की शुरुआत हो चुकी है. किंडल के बेसिक मॉडल की कीमत 13 हजार रुपए है वहीं इसके
डीलक्स मॉडल की कीमत लगभग 25 हजार रुपए है. कीमत का यह फर्क इसकी स्टोरेज क्षमता और स्क्रीन के आकार को
लेकर है.

ई-बुक पाई की शुरूआत
इसके साथ ही हाल ही में एक एक इंडियन कंपनी ने ई-बुक पाई नाम से एक सिस्टम डेवलप किया है. इन्फीबीम कंपनी
ने इसे लांच किया है.  यह कंपनी भी पहले ऑन लाइन बुक्स बेचा करती थी. जहां पर भी बुक्स को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से
आसानी से पढ़ा जा सकता है. पाई की कीमत 10 हजार रुपए है. इसकी स्क्रीन छ इंच है. इसकी मेमोरी 512 एमबी की
है. इसमें एक लाख से ज्यादा बुक्स स्टोर हो सकती है. इसका बैटरी एक हफ्ते तक चलता है. इसका वजन 180 ग्राम है.

'यह सही है कि बरेलियंस में रीडिंग हैबिट काफी कम है. कुछ सेलेक्टेड लोग ही रेग्युलर बुक्स बॉय करते हैं. यूथ तो केवल मेट्रो रीडिंग ही पसंद करता है. पर इनका नंबर भी काउंटेबल है. प्रेमचंद्र, जयशंकर प्रसाद को पढऩे वाले तो ढूंढने से ही मिल पाते हैं.'
संतोष वर्मा, सिंडिकेट बुक शॉप ओनर

'पढऩे की इच्छा डेवलप करें. बेटर एजुकेशन के साथ ही बुक रीडिंग की हैबिट इनकल्केट की जा सकती है. स्कूल में टीचर्स
और घर में पेरेंट्स को स्टूडेंट्स को रीडिंग के लिए प्रमोट करना चाहिए. ट्विटर, फेसबुक ने तो लैंग्वेज खराब की है.
लिटरेचर को तो मार ही दिया गया है.'
पंकज त्यागी, रेग्युलर बुक रीडर