- आरक्षित क्षेत्र में साल के पेड़ों की अवैध कटाई का था आरोप

- पिछले चार वर्ष से एनजीटी में चल रहा था केस

- एक माह के भीतर जुर्माना जमा करने के आदेश

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देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने आरक्षित वन क्षेत्र में साल के पेड़ों की अवैध कटाई के मामले में 46 लाख 14 हजार 960 रुपये का जुर्माना लगाया है. एनजीटी ने एक महीने के भीतर जुर्माने की रकम डीएफओ ऑफिस में जमा करने के आदेश जारी किए हैं. जुर्माना न देने पर वसूली की कार्रवाई की जाएगी.

4 वर्ष से चल रहा था मामला

पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू के खिलाफ एनजीटी में यह मामला बीते चार साल से चल रहा था. एनजीटी ने मई 2018 में फैसला सुरक्षित कर दिया था. सोमवार को एनजीटी के न्यायाधीश रघुवेंद्र सिंह राठौर की पीठ ने फैसला सुनाया. ट्रिब्यूनल ने पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू पर देहरादून के वीरगिरवाली गांव में आरक्षित वन क्षेत्र में जमीन खरीदने, भूमि का उपयोग बदलने और अवैध तरीके से साल के पेड़ों की कटाई करने का मामला सही पाया. इस दौरान सिद्धू के बयानों में विरोधाभास पाया गया. जबकि मुख्य सचिव, कमिश्नर, जिलाधिकारी के शपथ पत्रों में भूमि को आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किए जाने की बात कही गई थी. इसके अलावा मिलीभगत जैसे तथ्यों की भी कोर्ट में पुष्टि हुई. कोर्ट ने करीब 103 पेज के आदेश में आरोपित पूर्व डीजीपी सिद्धू को साल के पेड़ों के अवैध कटान पर दस गुना जुर्माना यानि 18 लाख 47 हजार 520 रुपये और आरक्षित वन भूमि खरीदने पर 27 लाख 64 हजार 440 रुपये का जुर्माना लगाया है.

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जुर्माने की रकम से होगा प्लांटेशन

एनजीटी ने पूर्व डीजीपी पर लगाए गए जुर्माने की रकम से वीरगिरवाली क्षेत्र और उसके आस-पास पौधरोपण करने के आदेश सरकार को दिए हैं. आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि काटे गए पेड़ों की जगह उचित प्रजाति के पौधे लगाए जाएं. इसके लिए एक ठोस योजना बनाकर सरकार पौधरोपण कराए.

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मामले पर एक नजर

पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू ने देहरादून में 20 नवंबर, 2012 को वन्य आरक्षित क्षेत्र में नत्थूराम नाम के काल्पनिक व्यक्ति से भूमि खरीद दिखाई थी. 13 मार्च, 2013 को जमीन का लैंड यूज भी बदल दिया गया. साथ ही वन्य क्षेत्र में स्थित कीमती साल के पेड़ों को अवैध तरीके से कटवाया गया. करीब 25 पेड़ कटाने की पुष्टि होने के बाद वन विभाग ने वर्ष 2013 में दो मुकदमे दर्ज किए थे. ये मुकदमे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और जिला न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में चले थे. मगर, समन भेजने की प्रक्रिया पर सवाल उठने के बाद दोनों मुकदमे हाई कोर्ट में लंबित चल रहे हैं.