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GORAKHPUR: बीआरडी मेडिकल कॉलेज के कैंसर विभाग में फ्री दवा का दावा फुस्स हो गया है। अभी भी धड़ल्ले से यहां आने वाले मरीजों को बाहर की ही दवाएं लिखी जा रही हैं। इसका खुलासा शुक्रवार को दैनिक जागरण आई नेक्स्ट की पड़ताल में हुआ। दूर-दराज से यहां सस्ते इलाज की आस में पहुंच रहे लोगों को दवाएं लिखने के नाम पर डॉक्टर सीधे बाहर का रास्ता दिखा दे रहे हैं। हाल ये कि यहां एक-दो दवा को छोड़ ज्यादातर दवाएं डॉक्टर बाहर की ही लिख रहे हैं।

एक हफ्ते में ही खर्च हो जाते 1500 रुपए
बता दें, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के कैंसर विभाग में रोजाना 50 से 60 मरीजों की ओपीडी होती है। लेकिन जिम्मेदारों की मनमानी के चलते इन लोगों को तमाम परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है। शुक्रवार को यहां के हालातों का जायजा लेने पहुंची दैनिक जागरण आई नेक्स्ट टीम को चौंकाने वाली हकीकत देखने को मिली। दोपहर के समय रिपोर्टर यहां पहुंचा तो यहां कुछ मरीज ओपीडी के सामने जमा थे तो कुछ सिंकाई कराने का इंतजार कर रहे थे। रिपार्टर ने कैंसर रोगी के साथ आए एक तीमारदार से दवाओं और इलाज के बारे में पूछा। पहले तो उसने बात नहीं की लेकिन फिर बताया कि सस्ते इलाज की उम्मीद में यहां इलाज शुरू कराया था लेकिन उल्टा जेब ढीली होती जा रही है। जहां दवाएं मुफ्त मिलनी चाहिए, वहीं डॉक्टर बाहर से दवाएं खरीदने को कहते हैं। इसके चलते एक हफ्ते की दवा में ही 1400 से 1500 रुपए खर्च हो जाते हैं। अस्पताल से केवल एक दो दवाएं मिलती हैं।

कैंसर के इलाज में करीब दो से तीन लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। सस्ते इलाज की उम्मीद में मेडिकल कॉलेज के कैंसर विभाग में आए। यहां इलाज तो मिलता है लेकिन कुछ ऐसे डॉक्टर हैं जो बाहर की दवाएं लिख रहे हैं जिससे जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
- इसराइल अहमद, गुलरिहा

मेरी सास फूलमती देवी के पेट मे ंगांठ बन गई है। जांच में पता चला कि कैंसर है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में उनका इलाज चल रहा है। डेढ़ माह से परेशान हैं। अब तक दवा पर आठ हजार रुपए खर्च हो चुके हैं।
- रविंद्र कुमार, कुशीनगर

गांठ बन गई थी। जांच रिपोर्ट में कैंसर का पता चला। प्राइवेट हॉस्पिटल में ऑपरेशन कराया जहां इलाज के एक लाख रुपए खर्च हुए। वर्तमान में इलाज मेडिकल कॉलेज के कैंसर विभाग में चल रहा है लेकिन यहां से कोई मदद नहीं मिल पा रही।
- संध्या, खजनी

मेरी पत्‍‌नी लक्ष्मीनी देवी के सीने में गांठ बन गई थी। कैंसर होने की जानकारी हुई। प्राइवेट हॉस्पिटल में ऑपरेशन कराया गया। ऑपरेशन में करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च हो गए। कुछ दवाएं अस्पताल से मिल जाती हैं। जो दवाएं नहीं मिलती हैं, डॉक्टर उसे लिख कर बाहर भेज देते हैं। चार से पांच हजार रुपए अभी तक दवा में खर्च हो गए हैं।
- कमलेश राय, पश्चिम चंपारण बिहार