घुमावदार दिखता है साइक्लोन
भारत मौसम विज्ञान विभाग के रांची केंद्र के कार्यकारी निदेशक जेएस जोजो ने बताया कि सेटेलाइट और डॉप्लर राडार की पकड़ में साइक्लोन आ जाता है. सामान्य बादल जहां नॉर्मल स्पीड से बढ़ते दिखाई देते हैं, वहीं साइक्लोन सेटेलाइट में घूमता हुआ दिखाई देता है. मौसम के फोरकास्ट के लिए वह लोग बैलून उड़ाते हैं. बादल, सतह की हवा और एयर प्रेशर देखते हैं. इसके अलावा एयर ह्यïूमिडिटी और स्पीड भी देखी जाती है. इसके बहाव की दिशा भी देखते हैं. फिर तब किसी रिजल्ट पर पहुंच कर मौसम की भविष्यवाणी करते हैं.

20 किमी तक जाता है बैलून
मौसम विज्ञान विभाग के रांची केंद्र में फिलहाल रोज सुबह साढ़े पांच बजे के पहले हाइड्रोजन गैस से भरा गुब्बारा उड़ाया जाता है. यह 16 से 20 किमी की ऊंचाई तक जाता है और इससे ऊंचाई के हर लेवल पर हवा की दिशा और तापमान का अंदाजा मिल जाता है. इससे मौसमी भविष्यवाणी में बहुत मदद मिलती है.

यूं मॉनसून की करते हैं पहचान
जेएस जोजो ने बताया कि मॉनसून के आने और जाने की पहचान करने में हवा की दिशा और उसमें ह्यूमिडिटी की मात्रा बहुत अहम होती है. यंू तो 1 जून से 30 सितंबर तक का समय मॉनसून सीजन माना जाता है, पर जब हवाएं दक्षिण पश्चिम दिशा से होकर यानी अरब सागर की ओर से आने लगे और उनमें ह्यïूमिडिटी की मात्रा रहे, तो यह मॉनसून के आगमन का संकेत करता है. फिर जब हवाओं का रुख उत्तर पश्चिम दिशा की ओर रहे और वायुमंडल में नमी की मात्रा नहीं के बराबर रहे, तो इससे

मॉनसून के विदा होने का संकेत माना जाता है.
मौसम विज्ञान के अंतर्गत मौसम से जुड़ी कई प्रोसेस और उससे संबंधित फोरकास्ट्स की स्टडी की जाती है. इसमें तीन मेन प्वाइंट्स एस्टिमेशन, टाइम और वेदर प्रेडिक्शन को शामिल किया जाता है. एस्टिमेशन प्रोसेस तापमान मापनेवाले सामान्य उपकरणों जैसे थर्मामीटर और एनिमोमीट से संपन्न होती है, वहीं सेटेलाइट के जरिए विश्व के मौसम का पूर्वानुमान संभव हो पाता है. एडवांस और सुपरकंप्यूटर से डाटा जमा करने का काम किया जाता है. इस क्षेत्र के अंतर्गत मौसम, जलवायु की डायनेमिकल, केमिकल और फिजिकल सभी सिचुएशन्स की स्टडी की जाती है, जो वातावरण और धरती की सतह पर घटित होती है. इसके सहारे एक खास निष्कर्ष तक एक्सपट्र्स पहुंच पाते हैं.