RANCHI: कहते हैं तेल देखिए और तेल की धार देखिए. दैनिक जागरण आईनेक्स्ट के अभियान तेल की मार के जरिए हम उन लोगों के दर्द को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जो रोजमर्रा की जिन्दगी में सिर्फ दौड़ते ही नहीं हैं बल्कि कड़ी धूप में खून जलाने के साथ महंगा पेट्रोल भी जलाने को मजबूर हैं. आज की इस कड़ी में हमने मार्केट में लगातार अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए दौड़ लगाते ऐसे 18 लोगों से बात की है, जो विभिन्न प्रकार की मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन, एमआर, सेल्स और रिकवरी के कारोबार से जुड़े हैं. सबका एक ही कहना है कि पेट्रोल के बढ़ते दाम ने उनके बजट का आकार बढ़ा दिया है. वैसे ही कंपनी का प्रेशर टारगेट को लेकर लगातार बना रहता है. ऊपर से पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि से उनकी परेशानी बढ़ गई है.

बाइक की शर्त पर जॉब, अब बढ़ा खर्च

सेल्स से जुड़े लोगों का कहना है कि मार्केटिंग का जॉब एक ऐसा सेक्टर है, जहां इंटरव्यू में पहला सवाल पूछा जाता है कि क्या आपके पास बाइक है? अगर है तो जॉब पक्की. एमआर हो, या सेल्स से जुड़े लोग उन्हें अमूमन हर दिन 50 से 150 किलोमीटर की रनिंग करनी ही पड़ती है. कभी ज्यादा प्रेशर रहा या टारगेट पूरा करना है तो दूसरे शहरों में भी जाना पड़ता है. इनका कहना है कि पहले जहां वे पेट्रोल में औसतन 100-120 रुपए प्रति दिन खर्च करते थे, अब उन्हें हर दिन 150 रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं.

तेल की मार को ऐसे समझिए

मान लें कि सिटी में करीब 50 हजार लोग सेल्स और अन्य सेक्टर से जुडे़ हैं, जो हर दिन औसतन 200 रुपए का तेल खर्च करते हैं. अगर एक व्यक्ति पर हर दिन 20 रुपए का लोड बढ़ा तो ये आकंड़ा एक दिन में एक लाख रुपए का होता है. मतलब हर महीने 30 लाख रुपए का लोड सेल्स से जुड़े लोगों पर पड़ा है.

तेज जलाइए या जॉब छोडि़ए

सेल्स एक ऐसा सेक्टर है, जहां रनिंग के अलावा कोई चारा नहीं है. आप कुछ भी कर लीजिए, आपको छोटे, मंझोले या फिर बड़े दुकानदारों के पास जाना ही होगा. एमआर को डॉक्टरों से संपर्क करना ही होगा. कई सेल्स सेक्टर से जुड़े लोगों ने कहा कि कोई चारा नहीं है, तेल तो जलेगा ही, और आपको टारगेट के अनुरूप काम करना ही होगा, वरना जॉब छोड़ने को तैयार रहिए.