अंधविश्वास के चलते स्जिोफ्रिनिया और हिस्टीरिया से ग्रस्त हो रहे मरीज

स्वास्थ्य विभाग ने धार्मिक स्थलों पर शुरू किया अभियान

Meerut. दैवीय प्रभाव या प्रेतात्माओं के असर और प्रेत बाधा के अंधविश्वास ने लोगों को कई न्यूरोलॉजिकल डिसआर्डर से ग्रस्त कर दिया है. स्थिति यह है कि बाबा, ओझाओं के चक्कर में पड़कर मरीज को सही इलाज नहीं मिल पा रहा है और वह हिस्टीरिया और स्जिोफ्रिनिया जैसी बीमारियों के हाई रिस्क जोन में आ चुके हैं. जिला अस्पताल की मानसिक ओपीडी में ऐसे कई केस पहुंच रहे हैं. ऐसे स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने जागरूकता अभियान शुरू कर दिया है.

यह है स्थिति

भूत-प्रेत और साया आदि से संबंधित समस्याओं को लेकर जिला अस्पताल में हफ्तेभर में करीब 15 से 20 मरीज पहुंच रहे हैं. अधिकतर केसों में मरीजों की स्थिति काफी गंभीर है. डॉक्टर्स के मुताबिक महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा हिस्टीरिया और स्जिोफ्रेनिया की चपेट में हैं. इन बीमारियों के मुख्य कारण मानसिक तनाव, स्ट्रेस सदमा, चिंता, प्रेम में असफलता, मानसिक दुख या गहरा आघात हैं. जिसके तहत मरीजों में जी मिचलाना, तेज या धीमे सांस चलना, बेहोशी छाना, हाथ-पैर अकड़ना, चेहरे की आकृति आदि बिगड़ने के लक्षण सामने आने लगते हैं. वहीं कई बार मरीज अचानक रोने या हंसने लगता है. दूसरों को बेवजह मारना भी इसका लक्षण है, जिसमें मरीज खुद को वास्तविकता से कई गुना ज्यादा ताकतवर समझने लगता है.

यह है स्जिोफ्रेनिया

स्जिोफ्रेनिया में मरीज खुद से बात करता है और हंसता व रोता है. कानों में आने वाली आवाजों को सच मानकर उनका जवाब देता है. इस स्थिति में व्यक्ति को भ्रम होने लगता है और उसे जो दिखाई नहीं देता वह उसे सच मान लेता है.

यह है िहस्टीरिया

इस स्थिति में मरीज के हाथ-पैर ऐंठ जाते हैं. वह बार-बार बेहोश होने लगता है. जीभ ऐंठ जाती है और दौरे पड़ने लगते हैं. मानसिक तनाव के कारण यह स्थिति पैदा हाेती है.

अभियान से जागरुकता

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला अस्पताल की मानसिक विभाग की टीम ने छतरी वाले पीर की मजार पर दुआ से दवा तक जागरूकता कैंप लगाया. इस दौरान कैंप में शामिल लोगों ने यहां आने वाले लोगों को मानसिक रोगों के बारे में जानकारी दी. वहीं लोगों को झाड-फूंक और टोने-टोटके की बजाए इलाज करवाने के लिए जागरूक किया. कैंप में डॉ. कमलेंद्र किशोर, डॉ. विभा नागर और डॉ. विनीता आदि शामिल रहीं.