- टीटीजेड के नियमों में ताजनगरी की इंडस्ट्रीज हो गई चौपट

- अभी तक नहीं किए जा सके कारगर उपाय

आगरा। टीटीजेड होने के बावजूद शहर प्रदूषण की मार से बेहाल है। टीटीजेड के नियमों ने आगरा के कारोबार को चौपट कर दिया, स्थिति ये है कि आज भी टीटीजेड के नियमों की जद में उद्योग सिसकने को मजबूर हैं। चुनावी सीजन चल रहा है, लेकिन अफसोस प्रदूषण राजनीतिक पार्टियों का चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। राजनीतिक पार्टियों के अपने घोषणा पत्र हैं, तो प्रत्याशियों के अपने दावे-वादे हैं, लेकिन आगरा की दम तोड़ती इंडस्ट्रीज की ओर किसी का ध्यान नहीं है। ऐसे ही कारकों को तलाशती ये रिपोर्ट

टीटीजेड बनने के बाद भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सका आगरा

आगरा टीटीजेड बनने के बाद भी प्रदूषण से मुक्त नहीं हो सका। टीटीजेड बनने का लाभ न तो यहां की टूरिज्म इंडस्ट्रीज को मिल सका, न ही अन्य इंडस्ट्रीज को। हालात ये हैं कि मौजूदा समय में प्रदूषण के मामले में आगरा की यूपी में आठवीं रैंक हैं। बता दें कि वर्ष 1999 में आगरा में टीटीजेड प्राधिकरण का गठन किया गया था। इसमें आगरा समेत 6 जिलों के 10400 वर्ग मी। में फैले क्षेत्रफल को भी शामिल किया गया था, जिसमें मथुरा, फीरोजाबाद, भरतपुर आदि जिले शामिल थे।

आवश्यकता 12 केन्द्रों की 7 ही कर रहे काम

शहर में एयर क्वालिटी इंडेक्स को मापने के लिए 12 प्रदूषण मापांक केन्द्रों की आवश्यकता है, लेकिन मौजूदा समय में इनकी संख्या केवल 7 ही है। पिछले कई वर्षो से इसके केन्द्रों में इजाफा नहीं किया जा सका है।

कभी आगरा की इंडस्ट्रीज की बोलती थी तूती आज खुर्द-बुर्द

कभी आगरा की आयरन, ऑटोमोबाइल्स पा‌र्ट्स, चारा मशीन, डीजल इंजन, टिल्लू पंप, प्रिटिंग मशीन, आटा चक्की, रबर लैदर, पेठा, पिस्टन, रिग्स,जनरेटर, लोहे की ढलाई आदि उद्योगों की तूती विदेशों में भी बोलती थी। लेकिन मौजूदा समय में सब खुद-बुर्द हो गया।

30 दिसम्बर 1996 से शुरू हुए आगरा की इंडस्ट्रीज के दुर्दिन दिन

आगरा की इंडस्ट्रीज के दुर्दिन दिन 30 दिसम्बर 1996 से शुरू हुए, जब एमसी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में रिट दाखिल की। उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आगरा की 511 इकाइयों को चिह्नित करते हुए टीटीजेड से बाहर शिफ्ट करने के निर्देश दिए। इसके बाद 30 अक्टूबर 2001 को आगरा इंडस्ट्रीज में कोयले के प्रयोग को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। उस दौरान 292 इकाइयों को बाहर शिफ्ट कर दिया गया। बता दें कि उसी दौरान सिकंदरा क्षेत्र में बजाज स्कूटर की कंपनी को स्थापित करने के लिए सर्वे किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद सब धूल-धूसरित हो गया

8 सितम्बर 2016 को लगाई गई रोक

पर्यावरण सचिव एएन झा द्वारा 8 सितम्बर 2016 को उद्योगों की रैड, ऑरेंज, ग्रीन श्रेणी बनाकर रोक लगा दी गई थी। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 26 सितम्बर 2018 को हाई पावर टेक्नीकल कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी का काम टीटीजेड की वायु प्रदूषणकारी इकाइयों को चिह्नित करना था। कमेटी द्वारा अपनी संस्तुतियां जनवरी 2019 में पर्यावरण मंत्रालय को भेजी जा चुकी हैं। इसमें होटल्स, हॉस्पिटल्स, वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट, जूता उद्योग की तदर्थ रोक हटाने की मांग की थी, लेकिन अभी मामला विचाराधीन है।

ये आठ कर रहे वातावरण को प्रदूषित

वातावरण में आठ तत्व, जो सबसे ज्यादा वातावरण को प्रदूषित करते हैं, इनमें पीएम 10 पार्टिकल मैटर जो हवा में मौजूद रहते हैं। इसके कण छोटे होते हैं। इसके अलावा पीएम 2.5 पार्टिकल मैटर के कण बड़े होते हैं। इसका मानक 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होता है। जब इसकी मात्रा बढ़ती है तो ये 200 से 300 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक हो जाते हैं। इससे सांस लेने में तकलीफ होने लगती हैं। इसके अलावा एनओ-टू, एसओ-टू, सीओ, ओ-थ्री, एनएच-3, पीबी हर समय मौजूद रहते हैं। इनकी विसंगति से वायु प्रदूषण बढ़ता है।

रोक के बावजूद भी खुलेआम जलाया जा रहा कूड़ा

टीटीजेड में रोक के बावजूद भी खुलेआम कूड़ा जलाया जा रहा है। यहां तक कि कूड़ा भी सड़कों पर बिखरा पड़ा रहता है। नगर निगम के सफाईकर्मी बजाए उसे उठाने के उसमें आग लगा देते हैं। इससे धुएं के गुबार उठते रहते हैं। कहने को जोनवार इसकी टीम गठित की गई है। नगर निगम के अधिकारियों का दावा है कि कार्रवाई की जाती है।

पौधारोपण तो हुआ, पर कहां हुआ ये जानकारी नहीं

शहर में पौधारोपण तो किया गया, ऐसा वन विभाग के अफसरों का दावा है, लेकिन पौधारोपण कहां हुआ, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। बता दें कि पौधारोपण के नाम पर बड़ा घोटाला हुआ है। विभागीय अधिकारी इसको छिपाए बैठे हैं। 15 से 30 सितम्बर 2018 तक सभी विभागों को पौधरोपण की जीओ टैगिंग रिपोर्ट भेजनी थी। सूत्रों के अनुसार अभी तक दर्जन भर विभागों ने रिपोर्ट नहीं भेजी है। टीम गठित कर पौधरोपण का भौतिक सत्यापन कर रिपोर्ट भेजनी थी।