- जनसंख्या ने जमीन पर बढ़ाया कब्जा

- हरियाली काटकर बना दिया कांक्रीट का जंगल

आगरा. विस्फोटक आबादी का सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर प्रकृति पर पड़ा है. बढ़ती आबादी ने देखते-देखते बाग-बगीचों, पेड़-पौधों और कृषि जमीन को कांक्रीट के जंगल में बदल डाला. इस बीच प्रकृति से जमकर छेड़छाड़ की गई. इसका नतीजा अब ग्लोबल वार्मिग के विभत्स रूप में सामने आया है. इसे रोकने के लिए जनसंख्या वृद्धि में ब्रेक लगाना बहुत जरूरी है.

काटे गए जंगल

आगरा जिले में भी बढ़ती आबादी का बुरा असर पर्यावरण पर पड़ा है. पिछले दो दशकों की आबादी और क्षेत्रफल में नजर डालें, तो साफ हो जाता है कि जंगलों को किस कदर से काटा गया. जमीन पर लोगों का कब्जा बहुत तेजी से बढ़ा. जहां वर्ष 2001 में 896 व्यक्तियों के लिए एक वर्गकिलोमीटर जमीन उपलब्ध थी. वहीं 2011 में बढ़ गई. इस दौरान 1094 व्यक्तियों को ही मात्र एक वर्गकिलोमीटर जगह मिली. यानी 98 व्यक्तियों का प्रतिवर्ग किमी पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया. ये दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. आबादी बढ़ने से शहर में जमीन की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है. लोग आशियाने के लिए खुली जमीन (ओपन या ग्रीन लैंड) को हथियाने में जुटे हुए हैं. इससे पर्यावरण में असंतुलन बढ़ रहा है. इसका दुष्परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने को मिल रहा है. आबादी पर नियंत्रण करके ही प्राकृतिक संतुलन बनाया जा सकता है.

बढ़ते कांक्रीट के जंगल

ग्रामीण क्षेत्र से शहर का क्षेत्रफल कम है. उस पर शहर की ओर तेजी से पलायन खाली जमीन को खत्म कर रही है. पेड़-पौधों, हरियाली व ग्रीनरी पत्थरों की इमारतों में खो गई हैं. बाकी जमीन पर भी कब्जा जारी है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि शहर में हरियाली बढ़ाने के लिए योजनाएं बनाकर पौधारोपण किया जा रहा है. फिर भी कांक्रीट के जंगल बनने का सिलसिला थम नहीं रहा है.