नरेश के संपर्क में कई सपा विधायक
सोमवार को नामांकन के दौरान हुए उलटफेर से यह भी साफ हो गया कि राज्यसभा चुनाव में भाजपा के नौ और सपा-बसपा के एक-एक प्रत्याशी के बीच चुनावी जंग होनी है। नौंवी सीट पर सपा प्रत्याशी जया बच्चन की जीत पक्की है क्योंकि सपा के पास उन्हें जिताने के पर्याप्त वोट हैं। वहीं दसवीं सीट पर बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को जीत के लिए सपा के अतिरिक्त वोटों के अलावा कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों के वोट की भी दरकार होगी। बसपा के साथ हुए समझौते के अनुसार अंबेडकर को सपा के करीब दस अतिरिक्त वोट भी मिलने हैं जिसकी उम्मीद नरेश अग्रवाल के भाजपा में शामिल होने के बाद कम नजर आ रही है। उल्लेखनीय है कि नरेश के पुत्र नितिन अग्रवाल सपा के विधायक  हैं। यह देखना रोचक होगा कि वह चुनाव के दौरान किसे वोट देते हैं। सपा के कुछ और विधायक भी नरेश अग्रवाल के संपर्क में बताए जा रहे हैं।

आठ की जीत पक्की, नौवें पर लगाया दांव
वहीं दूसरी ओर भाजपा गठबंधन के पास 324 विधायक हैं जिससे केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली समेत भाजपा के आठ उम्मीदवारों की जीत तय है। राज्यसभा जाने के लिए एक उम्मीदवार को 37 वोटों की जरूरत होगी। इस तरह भाजपा के आठ उम्मीदवारों की जीत के बाद भी उसके गठबंधन के पास 28 वोट शेष बचेंगे। माना जा रहा है कि अनिल अग्रवाल को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में इन्ही शेष बचे वोटों के भरोसे चुनाव में उतारा गया है। ध्यान रहे कि इस चुनाव में विधानसभा के सदस्य मतदाता होते हैं। उन्हें अपने मत पत्रों को दिखाकर वोट डालना होता है। मतपत्रों को दिखाकर वोट डालने का नियम बसपा उम्मीदवार को फायदा पहुंचा सकता है।

नरेश अग्रवाल: सियासी जोड़-तोड़ और विवादों के नरेश,bjp कर चुकी है इनके बयानों का व‍िरोध

निर्दलीय विधायकों के वोट बने कीमती
राज्यसभा चुनाव में हुए नामांकनों के बाद निर्दलीय विधायकों के वोट सारे दलों के लिए बेशकीमती हो गये हैं। खास बात यह है कि उनके वोटों की जरूरत बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को होगी। सियासी जानकारों की माने तो तीन निर्दलीय विधायकों में से दो रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' और अमनमणि त्रिपाठी बसपा प्रत्याशी को जिताने के लिए वोट नहीं डालेंगे। ध्यान रहे कि राजा भैया पर बसपा शासनकाल में पोटा लगाया गया था। उनके पिता को भी लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था। वहीं अमनमणि त्रिपाठी भी अपना वोट बसपा को देकर सीएम योगी आदित्यनाथ की नाराजगी मोल नहीं लेंगे।

विवादों के भी नरेश हैं नेरश अग्रवाल

नरेश अग्रवाल का विवादों से गहरा नाता रहा है। सूबे की राजनीति में सबसे ज्यादा दलबदलू नेताओं में उनका नाम शुमार किया जाता है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत निर्दलीय विधायक के रूप में की थी। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गये। वर्ष 1997 में जब बसपा के साथ भाजपा का गठबंधन टूटा तो नरेश अग्रवाल 17 विधायकों को साथ लेकर कांग्रेस से अलग हो गये और लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी बनाकर भाजपा सरकार में शामिल हो गये। भाजपा ने उन्हें ऊर्जा मंत्री भी बनाया। वहीं वर्ष 2002 में उन्होंने फिर पलटी मारी और सपा ज्वाइन कर ली।

बयान की भी खासी भत्सर्ना की गयी थी

वर्ष 2007 में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने सपा भी छोड़ दी और बसपा में आ गये। इसके बाद फिर उन्होंने बसपा का दामन छोड़कर सपा ज्वाइन कर ली। वहीं उनके बयानों ने भी अक्सर देश और प्रदेश की राजनीति में विवाद खड़े कर दिए। सोमवार को भाजपा ज्वाइन करने के बाद उन्होंने सपा प्रत्याशी जया बच्चन को लेकर कहा कि 'फिल्मों में डांस और एक्टिंग करने वालों से मेरी तुलना कर दी गयी। मेरा टिकट काट दिया गया'। इसे लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी आपत्ति भी जताई। वहीं इससे पहले उन्होंने पाकिस्तान जेल में बंद कुलभूषण जाधव को लेकर कहा था कि 'पाकिस्तान कुलभूषण को आतंकवादी मानता है और उसी हिसाब से व्यवहार कर रहा है'। उनके इस बयान की भी खासी भत्सर्ना की गयी थी।

भाजपा ने पुरजोर तरीके से विरोध किया था

इतना ही नहीं उन्होंने संसद में भगवान राम समेत हिंदू देवी-देवताओं को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की जिसका भाजपा ने पुरजोर तरीके से विरोध किया था। संसद में पीएम मोदी को 'चायवाला' कहने वाले नरेश ने हाल ही में राजधानी में हुए वैश्य सम्मेलन मे पीएम मोदी को 'तेली' बोला जिसका लोगों ने विरोध किया और उन्हें सम्मेलन छोड़कर जाना पड़ा। वहीं सपा में रहने के दौरान उनके निशाने पर आजम खान और शिवपाल सिंह यादव आते रहे। सपा में रार के दौरान भी उन्होंने शिवपाल को लेकर खूब बयानबाजी की।
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