बरेली: बाबा त्रिवटी नाथ मंदिर में चल रही श्रीरामचरितमानस कथा के आठवें दिन कथा ऋषि पंडित उमाशंकर व्यास ने सीताजी की खोज की यात्रा की कथा सुनाई। कहा कि इस यात्रा में हनुमान जी सबसे पीछे चल रहे हैं, जबकि वह समस्त गुणों में सबसे आगे हैं। वह आगे रहने की प्रतिस्पर्धा में रुचि नहीं लेते हैं, इसका व्यवहारिक अभिप्राय यह है कि प्रतिस्पर्धा में उन्नति तो है, लेकिन शांति नहीं है।

शांति के लिए उन्नति का त्याग जरूरी

कितना भी योग्य व्यक्ति हो तथा कितनी भी वह तैयारी करें किंतु यह चिंता लगी रहती है, कि प्रतियोगिता में प्रतिद्वंदी आगे ना निकल जाए। दूसरी ओर शांति को पाने की इच्छा में उन्नति का त्याग करना पड़ता है। बताया कि यात्रा के प्रारंभ में सारे वानर भोजन, पानी तथा निद्रा आदि का परित्याग कर देते हैं। किंतु एक महीने के बाद शरीर ने अपना प्रभाव दिखाना प्रारंभ किया। भूख प्यास से तड़पने लगे। एक महीने बाद बंदरों को भूख प्यास सताने लगी। हनुमान जी ने देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि इन लोगों को भूख भी लग रही है और प्यास भी। परंतु मुझे न भूख लग रही है और न ही प्यास।

राम नाम अमृत

हनुमान जी राम नाम की मुद्रिका को मुख में रखकर चल रहे हैं तथा राम नाम अमृत है और राम नाम लड्डू भी है तो जो भी अमृत पीता हुआ चल रहा है और जिसके मुख में लड्डू है, उसे भूख प्यास क्यों लगेगी। कथा व्यास बताते हैं कि इसका सीधा तात्पर्य है शांति तथा भक्ति की खोज की यात्रा का प्रारंभ राम नाम के आश्रय से ही होगा। प्रताप चंद्र सेठ, हरिओम अग्रवाल तथा मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल आदि मौजूद रहे।