- साल दर साल जर्जर हो रहा भवन

- हिंदी दिवस के मौके पर ही होती है साफ-सफाई

आई कंसर्न

मेरठ. हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य के विकास के लिए 1960 में बना पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन अपने अस्तित्व को तलाश रहा है. दरअसल हिंदी भवन को नई पीढ़ी के लिए हिंदी साहित्य के विषय में जानकारी देने वाली एक लाइब्रेरी के रुप में विकसित किया गया था. लेकिन आज हालत यह है कि ना तो यहां हिंदी साहित्य की किताबें हैं और ना ही साहित्य की तलाश में कोई आता है. समय की मार के कारण हिंदी भवन बदहाल है.

सहाय प्रेमी ने रखी थी नींव

गौरतलब है कि सन्1960 में हिंदी भवन की नींव एक ट्रस्ट गठित कर विशंम्बर सहाय प्रेमी ने रखी थी. इसके बाद कई सालों तक हिंदी भवन में बड़े-बड़े साहित्य आयोजन किए गए. जिनमें महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे बड़े साहित्यकार भी शामिल हुए थे. लेकिन हिंदी भवन के शुरुआती संस्थापकों व ट्रस्ट के सदस्यों की मृत्यु के बाद हिंदी भवन का अस्तित्व समाप्त होने लगा.

नहीं रहा रुझान

दस साल से भी अधिक समय से हिंदी भवन हिंदी साहित्यकारों व साहित्य के शौकीनों की कमी से जूझ रहा है. हिंदी साहित्य के प्रति नव युवकों का रुझान कम होने के कारण हिंदी के नये साहित्य में भी कमी आ गई. जिस कारण से हिंदी भवन में किताबों की संख्या साल दर साल कम हो गई. आज हिंदी भवन में पुराने हिंदी साहित्य की किताबें धूल फांक रही हैं और हिंदी भवन जर्जर हो चुका है.

इमारत हुई खराब

हिंदी भवन की बदहाली का यह आलम है कि आज हिंदी भवन बदहाल है. लाइब्रेरी की मुख्य इमारत जर्जर है.

आज आयोजित होगा कार्यक्रम

हिंदी भवन में हिंदी दिवस के अवसर पर लंबे समय बाद हिंदी भवन में कवि सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. जिसमें हिंदी साहित्य से जुडे़ कवियों और साहित्यकारों को बुलाया गया है. फिलहाल हिंदी भवन को सेठ दयानंद गुप्ता और दिनेश चंद जैन द्वारा संचालित किया जा रहा है.

हिंदी भवन का इतिहास बहुत ही गौरवमयी रहा है. लेकिन आज इसके संस्थापकों की मौत होने के बाद रखरखाव के अभाव में भवन जर्जर हो चुका है. लेकिन ट्रस्ट द्वारा हिंदी भवन को नए सिरे से विकसित करने का प्रयास किया जाएगा.

- डॉ. राम गोपाल, सलाहकार हिंदी भवन

इंट्रो- एक ओर आधुनिकता का दौर है तो दूसरी ओर हिंदी कवि सम्मेलनों में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है. कई नामचीन कवि हिंदी की पताका को देश दुनिया में फहरा रहे हैं.

वर्जन

हिंदी ने अपनी दिशा और दशा नि:श्चित रूप से सुधारी है. आज जहाँ एक ओर हिंदी को समर्पित सांस्कृतिक आयोजन पूरे देश में बड़े स्तर पर हो रहे हैं वहीं विदेशों में भी हिंदी के आयोजनों की मांग बढ़ी है. एशिया, अमेरिका, अफ्रीका हर जगह हिंदी के अनवरत आयोजन हो रहे हैं. कवि सम्मेलन, लाफ्टर शो आदि के माध्यम से भी हिंदी ने विस्तार पाया है.

सौरभ जैन सुमन कवि

पहले कहीं हिंदी कवि सम्मेलन बौद्धिक श्रोताओं तक ही सीमित थे किंतु आज हर त्योहार हर मेले आदि में ही नहीं वरन अधिकांश महाविद्यालयों में, विश्व-विद्यालयों में निजी विद्यालयों में ये बहुतायत में हो रहे हैं. कॉरपोरेट की बात करें तो उनमें भी कस्टमर मीट आदि में कवि सम्मेलन हो रहे हैं जोकि हिंदी की विस्तार को बढ़ा रहे हैं.

डॉ. अनामिका जैन अम्बर कवियत्री

हिंदी हमारे देश की मातृभाषा है ये दर्पण है हमारी संस्कृति का. हिंदी ने पंख फैलाये तो जरूर हैं किंतु इसकी दुर्दशा भी स्पष्ट दिखाई देती है.

डॉ. ममता वाष्र्णेय कवियत्री

हिंदी का यह संक्रमण काल चल रहा है. युवाओं को हिंदी के प्रति रुझान जगाना होगा. रोजगार के अवसर सिमटने से हिंदी पढ़ने वालों की संख्या लगातार घट रही है.

डॉ. हरिओम पंवार, अंतरराष्ट्रीय कवि

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