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PATNA : शौचालय घोटाला के बाद अब आवास घोटाला सामने आया है. अधूरे आवासों के नाम पर ही नहीं एक ही परिवार को कई आवास देकर बड़ा खेल खेला गया है. पांच साल के आंकड़ों पर गौर करें तो 50 प्रतिशत आवास भी लाभार्थियों को नहीं मिल पाए हैं और धन मुक्त कर दिया गया है. सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी से हुए खुलासे के बाद बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने जांच कर घोटालेबाजों पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है.

निकाल दिया योजना का दम

इंदिरा आवास की आस लगाए बैठे लोगों को घर का सपना दिखाकर करोड़ों का खेल कर दिया गया है. पटना सहित प्रदेश के अन्य जिलों में पांच साल पचास प्रतिशत लोगों को आवास नहीं मिल सका है. पटना में 64 हजार से अधिक आवासों की स्वीकृति हुई लेकिन 37 हजार आवास में योजना की दम निकाल दी गई.

एक नजर में जानिए नियम

इंदिरा आवास केंद्र सरकारी की योजना है. यह ऐसे परिवारों के लिए बनाई गई है जिनके पास आवास नहीं होता है. बीपीएल सूची के आधार पर इनकी लिस्ट तैयार की जाती है. इसकी मॉनीटरिंग डीएम से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी करते हैं. एक आवास के लिए वर्तमान में डेढ़ लाख रुपए दो किस्तों में दी जाती है. पहली किस्त निर्माण शुरू करने के पहले और दूसरी किस्त भवन का आधा निर्माण हो जाने के बाद दिया जाता है. यह धनराशि लाभार्थी के बैंक अकाउंट में भेजी जाती है.

ऐसे होता है घोटाले का खेल

जिस समय लाभार्थी से खाता खोलवाया जाता है उसी समय घोटाले का पूरा प्लान तैयार कर लिया जाता है. खाता खुलवाने के दौरान ही लाभार्थी से पैसा निकासी फॉर्म पर अगूंठा या हस्ताक्षर करा लिया जाता है. जब उसके खाते में भवन के लिए किस्त आती है तो सबसे पहले पंचायत सचिव को जानकारी हो जाती है. इस आधार पर वह अन्य जिम्मेदारों के साथ मिलकर पैसा निकाल लेता है.

आरटीआई में अधूरी दी जानकारी

लोक सूचना पदाधिकारी विजय कांत राय ने अजीत कुमार सिंह को जो जानकारी दी है उसमें भी खेल कर दिया गया है. इस पूरे मामले में पूरी जानकारी नहीं दी गई है. ऐसे बिंदुओं को छिपा लिया गया है जिससे घोटाले का पूरा खुलासा हो जाए. सूचना में पटना सहित प्रदेश के 39 जिलों के साथ निर्माण की पूरी डिटेल दी गई है. एक्टिविस्ट अजीत ने इस मामले में शासन से शिकायत कर निष्पक्ष जांच करने की मांग की है. उनका आरोप है कि करोड़ों के घोटाला शौचालय घोटाले से कम नहीं है. इसकी जांच कराकर घोटालेबाजों को बेनकाब किया जाए.

आवास रह गया अधूरा फिर भी निकल गया पैसा

दोनों किस्त बड़ी चालाकी से निकाल ली जाती है और आवास अधूरा ही पड़ा रह जाता है. कुछ लाभार्थियों को थोड़ा बहुत पैसा देकर मोटी रकम जिम्मेदार ही डकार जाते हैं. जांच भी होती है तो मामले में गोलमाल कर दिया जाता है. हालांकि ऐसे मामले पकड़ में भी आए हैं लेकिन इसके बाद भी अंकुश नहीं लग पा रहा है.

ऐसे हुआ इंदिरा आवास घोटाले का खुलासा

आरटीआई एक्टिविस्ट अजीत सिंह ने ग्रामीण विकास विभाग से पिछले 5 वित्तीय वर्षो में पटना सहित पूरे राज्य में स्वीकृति एवं निर्मित इंदिरा आवास के संबंध में ब्योरा मांगा था. इसमें स्वीकृति आवासों, निर्मित आवासों और अधूरे पड़े आवास की जिलावार सूची मांगी थी. अब तक कितने लाभार्थियों के खिलाफ केस कराया गया, यह भी पूछा था.

मुझे इसकी जानकारी नहीं है. इसका डिटेल सामने आने पर ही कोई एक्शन हो सकता है.

कुमार रवि, डीएम पटना