घोटाला सामने आने के बाद निदेशालय ने विजिलेंस को नहीं भेजी जांच
ईडी ने विजिलेंस से मांगी जानकारी तो खुला दोषियों को बचाने का खेल
सालों से चल रहा कमर्शियल पायलट लाइसेंस में फीस प्रतिपूर्ति का घोटाला

करोड़ों रुपये की फीस प्रतिपूर्ति देने से जुड़ा

lucknow@inext.co.in  
लखनऊ।
हैरत की बात यह है कि शासन द्वारा आज तक इसकी जांच शुरू नहीं कराई गयी है। इसका खुलासा तब हुआ जब इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने विजिलेंस से जांच से जुड़ी जानकारी लेनी चाही। विजिलेंस द्वारा ईडी को भेजे पत्र में कहा गया है कि इस तरह के किसी भी मामले की जांच उनके द्वारा नहीं की जा रही है। मामला समाज कल्याण विभाग में कमर्शियल पायलट लाइसेंस पाठ्यक्रम के लिए फर्जी छात्रों से आवेदन कर उन्हें करोड़ों रुपये की फीस प्रतिपूर्ति देने से जुड़ा है। सूत्रों की मानें तो यह घोटाला वर्ष 2009 से जारी है जिसमें विभाग को महंगी फीस प्रतिपूर्ति की वजह से खासा नुकसान सहना पड़ रहा है।

अब तक कोई भी जवाब नहीं दिया गया

करोड़ों रुपये के इस घोटाले की भनक मिलने के बाद ईडी ने इस मामले की जांच शुरू करने का निर्णय लिया है जिसके बाबत समाज कल्याण विभाग के निदेशक को दो बार इससे जुड़े दस्तावेज मुहैया कराने का पत्र भेजा जा चुका है। हैरत की बात यह है कि ईडी के पत्र का अब तक कोई भी जवाब नहीं दिया गया है। इस बीच ईडी के अफसरों ने विजिलेंस से जानकारी मांगी तो उन्होंने इस तरह की कोई जांच किए जाने से इंकार कर दिया। अब ईडी तीसरी बार निदेशक को पत्र भेजने की तैयारी में है। इसका जवाब न आने की सूरत में उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

जिनका वजूद नहीं, उन्हें करोड़ों का भुगतान
सालों से निदेशालय में चल रहे इस घोटाले में ओपन स्कूल के छात्रों को भी फीस प्रतिपूर्ति किए जाने की शिकायतें है। वहीं प्रदेश के बाहर के कई ऐसे संस्थान, जिनका अब कोई वजूद भी नहीं है, उन्हें भी करोड़ों रुपये फीस प्रतिपूर्ति के रूप में बांट दिए गये। इनमें से ज्यादातर कमर्शियल पायलट ट्रेनिंग संस्थान मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और गुजरात के हैं। इनमें से कई तो बिना ट्रेनिंग दिए ही संस्थान को बंद कर चुके है। दूरदराज के संस्थान होने की वजह से विभाग इनसे रिकवरी भी नहीं कर पाया। इसी तरह कई संस्थानों में फर्जी छात्रों के नाम पर फीस प्रतिपूर्ति भी की गयी। फिलहाल ईडी को निदेशालय में सालों से जमे एक अफसर और बाबू के घोटाले में शामिल होने की गोपनीय शिकायतें भी मिली हैं।

स्कॉलरशिप घोटाले में फआईआर की सिफारिश
सपा सरकार में मेरठ के मदरसों-विद्यालयों में स्कॉलरशिप घोटाले में यूपी पुलिस के आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (ईओडब्ल्यू) ने शासन को भेजी अपनी जांच रिपोर्ट में एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की है। जांच में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के जिला कार्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। डीजी ईओडब्ल्यू आरपी सिंह ने बताया कि ईओडब्ल्यू की जांच में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी से लेकर अन्य कर्मचारियों व मदरसों-विद्यालयों की भूमिका सवालों के घेरे में है। माना जा रहा है कि पूरे प्रकरण की सिलसिलेवार जांच कराए जाने पर अन्य जिलों में भी छात्रवृत्ति घोटाला सामने आ सकता है।

छात्रवृत्ति के वितरण में हुई धांधली की जांच
दरअसल, ईओडब्ल्यू ने शासन के निर्देश पर मेरठ में वर्ष 2010-11 में मदरसों व विद्यालयों में छात्रवृत्ति के वितरण में हुई धांधली की जांच की है। कुल 54 मामलों के तहत 145 मदरसों-विद्यालयों की जांच की जानी है। ईओडब्ल्यू 53 मामलों के तहत करीब 50 मदरसों-विद्यालयों की जांच पूरी कर चुका है। इनमें करीब 45 मदरसों-विद्यालयों में छात्रवृत्ति के वितरण में गड़बड़ी सामने आई है। कुछ ही मदरसे-विद्यालय ऐसे हैं, जहां छात्रवृत्ति दी गई। सूत्रों का कहना है कि अब तक की जांच में करीब तीन करोड़ की धांधली सामने आई है। उल्लेखनीय है कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के जरिए छात्रवृत्ति दी गई थी।

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