शास्त्रों में नारियों को मिला है देवी का दर्जा, पूजा का है विधान

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ALLAHABAD: महिलाएं हमेशा से समाज को दिशा देने में समर्थ रही हैं. महिलाएं न ही कभी अज्ञानी रही हैं और न ही अबला. महिलाएं हमेशा ही अपनी विद्वता, मेहनत व योग्यता से हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चली हैं. हर जगह में उनकी प्रतिभा का सम्मान है तो धर्म में अपमानित क्यूं किया जा रहा है. ये बातें बुधवार को सत्य सर्वेश्वर सेवा संस्थान की अध्यक्ष एवं युवा संत संपर्क प्रमुख देवी निहारिका ने माघ मेला में आयोजित भागवत कथा में कही. उन्होंने कहा कि इन दिनों कुछ धर्मगुरु महिलाओं के व्यास पीठ पर बैठने का विरोध कर रहे हैं जो अनुचित है. जबकि कई ऐसे लोग भी व्यास पीठ पर बैठ रहे है, जो उसके योग्य नहीं है.

कथा में नियमों का पालन नहीं

भागवत के महात्म्य के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए देवी निहारिका ने कहा कि भागवत महात्म्य के छठें अध्याय के 20वें श्लोक में भागवत कथा कहने का नियम बताया गया है. उसमें कहा गया है कि कथावाचक ब्राह्माण हो, गृहस्थ न हो, शारीरिक रूप से कुरूप न हो. क्या इसका पालन हो रहा है? आज ब्राह्माण से इतर, गृहस्थ लोग कथा कह रहे हैं. उन्हें धर्मगुरु क्यों नहीं रोक रहे हैं, क्या सारे नियम सिर्फ महिलाओं के लिए बने हैं. अगर महिलाओं के वेद पढ़ने पर पाबंदी है तो वेद विद्यालयों में उन्हें क्यों पढ़ाया जा रहा है.

महिला को मिला है देवी का दर्जा

धर्मग्रंथों में महिला को देवी का दर्जा दिया गया है, लेकिन कुछ धर्मगुरु चर्चा में बने रहने के लिए उन्हीं का अपमान कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब महिलाएं घर, परिवार छोड़कर संन्यास ले सकती हैं तो उन्हें वेद पढ़ने व व्यास पीठ पर बैठने से कोई कैसे रोक सकता है. धर्म में स्त्री, पुरुष का भेद खत्म करके सिर्फ सनातन संस्कृति के उत्थान पर चर्चा होनी चाहिए, जिसकी आज जरूरत है. इस अवसर पर हजारों की संख्या में पंडाल में मौजूद रहे.