श्रवण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाने वाली नाग पंचमी शिव जी की पूजा भी है। शिवजी के गले में वासुकि नाग है। समुद्र मंथन से निकले 'कालकूट’ विष को गले में धारण कर शिव ने सृष्टि का विनाश होने से बचाया था। भगवान शिव के गले में हार के रूप में सुशोभित 'अनंत’ नामक नाग कालकूट विष के दाह को कम करते हैं। ये मानव शरीर में मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक मेरुदंड स्वरूप हैं।

दरअसल, श्रवण के संस्कृत शब्द का अर्थ है- 'सुनना’। जीवन में ज्ञान समावेष करने का पहला कदम 'श्रवण’ है। पहले हम ज्ञान सुनते हैं (श्रवण), फिर बार-बार उसे अपने मन में दोहराते हैं- यह है 'मनन’, फिर वह ज्ञान हमारे जीवन में समाहित होकर हमारी संपत्ति बन जाता है- यह है 'निधिध्यासन’। यह मास है ज्ञान में डूबने का, बड़े-बुजुर्गों से सीखने का और ज्ञान के पथ पर चलने का।

शिवतत्व से कर सकते हैं साक्षात्कार

सावन विशेष: कृपा से भरी हैं शक्ति और करुणा से भरे शिव

पार्वती जी ने इसी मास में शिवजी की पूजा की थी। शिव को पाने के लिए उन्होंने तपस्या की थी। इस समय हम अपने अंत:करण में डुबकी लगाकर वहां व्याप्त शिवतत्व से साक्षात्कार कर सकते हैं। पार्वती शक्ति का रूप हैं शक्ति ही इस पूरी सृष्टि का गर्भस्थान हैं- अत: इस दिव्य पहलू को माता का रूप दिया गया है। शक्ति ही जीवन-ऊर्जा है। इस दिव्य ऊर्जा, शक्ति के विभिन्न कार्यों के अनुसार उसके अनेकों नाम और रूप हैं।

'इ’ के बिना 'शिव’ बन जाता है- 'शव’

सावन विशेष: कृपा से भरी हैं शक्ति और करुणा से भरे शिव

'शक्ति’ में जो 'इ’ है, वह ऊर्जा है। 'इ’ के बिना 'शिव’ बन जाता है- 'शव’। गतिशीलता की अभिव्यक्ति ही शक्ति है। शिव तत्व अवर्णनीय है। तुम हवा को बहते हुए महसूस कर सकते हो, पेड़ों को झूमते हुए देख सकते हो, लेकिन उस स्थिरता को नहीं देख सकते जो इन सभी गतिविधियों का संदर्भ बिंदु हैं। यह गतिशील अभिव्यक्ति शक्ति है। शिव करुणा से भरे हैं और शक्ति कृपा से भरी हैं।

उत्सव के साथ प्रेम और ज्ञान का समावेश ही जीवन की पराकाष्ठा है

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के साथ ही उनके प्रतीकों और वाहनों की पूजा-उपासना की भी परंपरा है। नाग पंचमी भी ऐसा ही एक पर्व है। दरअसल, नाग को देवता की संज्ञा दी जाती है और उनकी पूजा के कई कारण हैं। नाग को आदि देव भगवान शिव शंकर के गले का हार और सृष्टि के पालनकर्ता श्री हरि विष्णु की शैय्या माना जाता है। इसके अलावा नागों का लोकजीवन से भी गहरा नाता है।

12 नागों में अनंत नाग सूर्य के रूप हैं, वासुकि चंद्रमा के, तक्षक मंगल के, कर्कोटक बुध के, पद्मा बृहस्पति के, महापद्मा शुक्र के और कुलिक व शंखपाल शनि ग्रह के रूप हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह पृथ्वी भी शेषनाग के फन पर ही टिकी हुई है। कहा जाता है कि दत्तात्रेय जी के 24 गुरु थे, जिनमें एक नाग देवता भी थे। नागों को खुश करने के लिए श्रवण मास में उनकी पूजा का विधान इसीलिए है क्योंकि यह शिव का माह है। उत्सव के साथ प्रेम, आनंद और ज्ञान का समावेश ही जीवन की पराकाष्ठा है।

श्री श्री रवि शंकर

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