यह तो आप जानते ही हैं कि कन्याकुमारी भारत का एक प्रसिद्ध स्थान है, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इस जगह का नाम कन्याकुमारी ही क्यों पड़ा? शिवपुराण के अनुसार, बानासुरन नाम के एक असुर ने देवताओं को पीड़ित कर रखा था। सभी देवता इस असुर से मुक्ति पाना चाहते थे, लेकिन कोई भी इसे मार नहीं पा रहा था, क्योंकि इस असुर को भगवान शिव की ओर से वरदान था कि उसकी मृत्यु केवल एक ‘कुंवारी कन्या’ के हाथों ही होगी। लेकिन यह सत्य है जो जन्मा है उसकी मृत्यु तो होनी ही है। और इसलिए राक्षस का वध करने के लिए आदिशक्ति के एक अंश से एक पुत्री का भारत पर राज कर रहे राजा के घर में जन्म हुआ। इस पुत्री का नाम रखा गया ‘कन्या’।

कन्या को भगवान शिव ने दिया था शादी वचन

जब कन्या बड़ी हुई तो उन्हें भगवान शिव से प्रेम हुआ और उन्हें पाने के लिए कन्या ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से भगवान शिव खुश हुए और शादी का वचन दिया। शादी की तैयारियां शुरू हुईं। शिव जी बारात लेकर निकले। लेकिन इस बीच नारद जी को भनक हुई कि कन्या कोई साधारण स्त्री नहीं बल्कि उनका जन्म बानासुर को मारने के लिए हुआ है। उन्होंने इस बात की खबर सभी देवताओं को दी।

देवताओं ने शिव जी के साथ किया छल, नहीं हुई शादी

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भगवान शिव की कैलाश से आधी रात को बारात निकली ताकि सुबह सही मुहूर्त पर दक्षिणी छोर पहुंच पाए। यहां सभी देवताओं ने मिलकर इस शादी को रोकने की योजना बनाई। बारात सुबह कन्या के द्वार पहुंचती, इससे पहले ही छल करके देवताओं ने रात के अंधेरे में ही मुर्गे की आवाज में बांग लगा दी। भगवान शिव को लगा कि वो सही मुहूर्त पर कन्या के घर नहीं पहुंच पाए और उन्होंने बारात कैलाश की ओर लौटा दी।

कन्या ने किया बानासुरन का वध 

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दूसरी ओर बानासुरन को ‘कन्या’ की सुंदरता के बारे में खबर हुई और शादी का प्रस्ताव भेजा। क्रोध में आई कन्या ने बानासुर से युद्ध लड़ने को कहा, साथ ही कहा कि यदि वो हार जाती हैं तो विवाह कर लेंगी। लेकिन कन्या का जन्म ही बानासुरन का वध करने के लिए हुआ था। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ और बानासुरन मारा गया। कन्या हमेशा के लिए कुंवारी रह गईं। इसी दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी पड़ा।

—ज्‍योतिषाचार्य पंडित श्रीपति त्रिपाठी

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