स्कूल के ड्राइवर या प्यून को पहचानते हैं, जानते नहीं पैरेंट्स

स्कूल प्रशासन भी सिर्फ वाहन स्वामी तक ही रखता है मतलब

allahabad@inext.co.in

ALLAHABAD: क्या आपका बच्चा स्कूल जाता है. ऐसा है तो उसके ट्राली, आटो या बस चालक का नाम जानते हैं? कंडक्टर, स्कूल माली या प्यून को पहचानते हैं? इन सवालों का जवाब आपके पास नहीं होगा और आपने अब तक ऐसा कुछ जानने की कोशिश भी नही की होगी. लेकिन ये गलत है. स्कूलों में बढ़ती घटनाओं को देखते हुए पैरेंट्स को जागरुक होना ही होगा. होशियार पैरेंट्स की तरह हमें पता होना चाहिए कि हम अपने लाडले या लाडली को किसके हवाले कर रहे हैं.

कोई नहीं जानता इनके बारे में

अक्सर पैरेंट्स सोचते हैं कि ट्राली, बस या आटो चालक या कंडक्टर के बारे में स्कूल प्रशासन को पता होगा. लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं है. स्कूल प्रशासन के पास भी इन लोगों की कोई पहचान नहीं होती. यही कारण है कि कोई भी घटना होने के बाद पैरेंट्स के साथ स्कूल प्रशासन भी पहचान को लेकर हाथ खड़े कर देता है.

पैरेंट्स नहीं जागरूक

तेलियरगंज के दीपक शुक्ला सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी चलाते हैं. उनकी बेटी क्लास फोर में पढ़ती है. मार्निग में ट्राली वाला आकर बच्ची को ले जाता है. जब दीपक से ट्राली चालक की पहचान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जानकारी से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि आज तक इस बारे में सोचा ही नहीं. हालांकि, उन्होंने माना कि भविष्य में वे यह जानकारी अपने पास जरूर रखेंगे.

मीरापुर की बबली खन्ना का बेटा पवित्रा टैगोर पब्लिक स्कूल में क्लास टू में पढ़ता है. उनका बेटा आटो से स्कूल जाता है. उनसे आटो ड्राइवर, स्कूल के माली या प्यून की पहचान के बारे में पूछा गया तो उनका सिर इंकार में हिलने लगा. इनका कहना था कि आटो में अन्य बच्चे भी होते हैं, इसलिए अपने आप विश्वास बढ़ जाता है लेकिन माना उन्होंने भी कि यह गलत है, जानकारी होनी चाहिए.

राजरूपपुर में रहने वाले लखपत सिंह का बेटा सरस्वती विद्या मंदिर में क्लास वन में पढ़ता है. स्कूल अधिक दूर नही है, लेकिन पति-पत्‍‌नी दोनों के सर्विस में होने के कारण उसे आटो से भेजना मजबूरी है. आटो वाला अपने समय पर आता है और बच्चे को लेकर चला जाता है, लेकिन इन्होंने भी कभी उसकी पहचान जानने की कोशिश नहीं की. हालांकि इसे लेकर जब सवाल किया गया तो इनका भी मानना था कि इसकी जानकारी जरूर होनी चाहिए.

झूंसी की रमा द्विवेदी का बेटा कृष्णा क्लास टू में पढ़ता है. शुरुआत में स्कूल बस से भेजा जाता था, लेकिन अक्सर बस लेट हो जाती. कभी ड्राइवर मिसिंग कर जाता. ऐसे में उन्होंने बच्चों को खुद स्कूल भेजने का निर्णय लिया. वह कहती हैं कि अक्सर आटो, ट्राली या बस चालक का व्यवहार अच्छा नहीं होता. ऐसे में विकल्प नहीं मिलने तक बच्चे को अपनी जिम्मेदारी पर स्कूल छोड़ना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान

कोशिश करें बच्चे को खुद स्कूल छोड़ने और लेने जाएं

किसी अनजान आदमी के भरोसे बच्चे को स्कूल न भेजें

बस, आटो या ट्राली चालक का पूरा नाम, पता आदि की जानकारी रखें

स्कूल की प्यून के बारे में भी पूरी जानकारी अवश्य पता करके रखें

यदि वाहन चालक या कंडक्टर का व्यवहार अच्छा नहीं है तो स्कूल में शिकायत करें

ड्राइवर, कंडक्टर और टीचर की पूरी जानकारी पैरेंट्स को उपलब्ध कराना स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी है. स्कूल और बस पर इनकी पूरी जानकारी देनी चाहिए. पैरेंट्स का रोल है कि बच्चों की कम्युनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वह अपने साथ हुई प्रत्येक घटना को बिना पूछे माता-पिता से रोज बताए. परिजनों को भी बच्चों से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की पूरी जानकारी रखनी चाहिए. लोग शारीरिक स्वास्थ्य की बात करते हैं लेकिन बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है.

डॉ. कमलेश तिवारी, मनोवैज्ञानिक