DEHRADUN : गढ़वाल क्षेत्र के ब्8 स्थानों पर अर्थक्वेक सेंसर लगाने और दून में अर्थक्वेक अर्ली वार्निग सिस्टम इंस्टॉल करने के बाद अब कुमाऊं में भी अर्थक्वेक सेंसर लगाने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है. कुमाऊं में दो दर्जन से ज्यादा संवेदनशील स्थानों पर सेंसर लगाए जाएंगे. ये पूरी योजना आईआईटी रुड़की के अर्थक्वेक साइंस डिपार्टमेंट द्वारा संचालित किया जाएगा.

ऐसे काम करता है सिस्टम

अर्थक्वेक सेंसर जियोलॉजिकल सर्वे के बाद उन स्थानों पर लगाये जाते हैं, जहां जमीन के भीतरी हिस्से में भूकम्प की परिस्थितियां विद्यमान होती हैं. सेंसर के आसपास के क्षेत्र में म् तीव्रता से अधिक का भूकम्प आते ही ये सेंसर आईआईटी रुड़की स्थित कंट्रोल रूम को सूचित करते हैं, जहां से अर्ली वार्निग जारी की जाती है. यह वार्निग उन सभी जगहों पर अलार्म के रूप में दी जाती है, जहां यह सिस्टम लगा होता है.

गढ़वाल क्षेत्र में 48 सेंसर

अर्थक्वेक अर्ली वार्निग सिस्टम के तहत फिलहाल गढ़वाल क्षेत्र में ब्8 जगहों पर इस तरह के सेंसर लगाये गये हैं. इसके साथ वार्निग सिस्टम जोड़ा जा रहा है. फिलहाल देहरादून के कलेक्ट्रेट परिसर में यह सिस्टम लगाया गया है. यह सिस्टम म् फ्रीक्वेंसी से ज्यादा के भूकम्प पर सक्रिय होगा. इस फ्रीक्वेंसी की वेब्स दिल्ली तक पहुंचेंगी, लिहाजा दिल्ली तक इस तरह के वार्निग सिस्टम लगाये जाएंगे. देहरादून में भी कई अन्य स्थानों पर वार्निग सिस्टम लगाने की योजना है.

उत्तराखंड में कितना खतरा

उत्तराखंड भूकम्प की दृष्टि से सबसे खतरनाक जोन भ् में स्थित है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश से लेकर नेपाल तक एक ऐसा थ्रस्ट सक्रिय है, जो बड़े भूकम्प की संभावना पैदा करता है. नेपाल में आया भूकम्प इसका उदाहरण है. उत्तराखंड में एक बड़े भूकम्प की संभावना इसलिए भी है कि यहां ख्क्भ् वर्ष पहले आये एक बड़े भूकम्प के बाद 7 या इससे अधिक तीव्रता का भूकम्प नहीं आया है. क्99क् में उत्तरकाशी में म्.8 और क्999 में चमोली में म्.ब् तीव्रता का भूकम्प आया था.