श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है, इस दिन अयोध्या के राजा दशरथ और श्रवण कुमार से जुड़ी एक घटना का भी जिक्र मिलता है। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को नेत्रहीन माता—पिता का एकमात्र पुत्र श्रवण (जो उनकी दिन रात सेवा करता था) एक बार रात्रि के समय जल लाने को गया, वहीं कहीं हिरण की ताक में दशरथ जी छुपे थे। उन्होंने जल के घड़े होने वाली आवाज को किसी पशु की आवाज समझ कर बाण छोड़ दिया, जिससे श्रवण की मृत्यु हो गई।

यह सुनकर उसके माता-पिता बहुत दुखी हुए। तब दशरथ जी ने उनसे अपने अज्ञान में किए हुए अपराध की क्षमा याचना करके श्रावणी को श्रवण पूजा का सर्वत्र प्रचार किया। उस दिन से संपूर्ण सनातनी श्रवण पूजा करते हैं और उक्त रक्षा सर्वप्रथम उसी को अर्पण करते हैं।

ऋषि तर्पण

यह भी श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को किया जाता है इसमें ऋग, यजु, साम के स्वाध्यायी  ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,  वानप्रस्थ या किसी आश्रम के हों, अपने-अपने वेद कार्य और क्रिया के अनुकूल काल में इस कर्म को संपन्न करते हैं। इसका आद्योपान्त पूरा विधान यहां नहीं लिखा जा सकता और बहुत संक्षिप्त लिखने से उपयोग में ही नहीं आ सकता है।

सामान्य रुप से यही लिखना उचित है कि उस दिन नदी आदि के तटवर्ती स्थान में जाकर यथा विधि स्नान करें। कुशा निर्मित ऋषियों की स्थापना करके उनका पूजन, तर्पण और विसर्जन करें। रक्षा पोटलिका बना कर उसका मार्जन करें। तदनंन्तर आगामी वर्ष का अध्ययन क्रम नियत करके सायं काल के समय व्रत की पूर्ति करें।

इसमें उपाकर्पमद्धति आदि के अनुसार, अनेक कार्य होते हैं। वे विद्वानों से जानकर यह कर्म प्रतिवर्ष सोपवीती प्रत्येक द्विज को अवश्य करना चाहिए। यद्यपि उपाकर्म चातुर्मास में किया जाता है और इन दिनों नदियाँ रजस्वला होती हैं। तथापि

उपकर्माणि चोत्सर्गे प्रेतस्नाने तथैव च।

चन्द्रसूर्यग्रहे चैव रजोदोषो न विद्यते।।

इस वशिष्ठ वाक्य के अनुसार उपाकर्म में उसका दोष नहीं माना जाता।

ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र, शोध छात्र, ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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