आलोचना और अपमान
जीहां अगर आप छोटों की अलोचना और बड़ों का अपमान ना करें तो आप के रिश्‍ते कभी खराब नहीं होंगे। अगर आप परिवार में अपने से छोटों को सही सलाह देते समय ये याद रखें कि ये तो बिलकुल बेवकूफ है या इसे तो कुछ समझ नहीं आता, ऐसे वाक्‍य ना बोलें और अपने से बड़ों की बातों को नजरअंदाज या पूरी तरह से साफ मानने से इंकार करके उनका अपमान करने की गलती ना करें तो आपके रिश्‍तों में प्‍यार बना रहेगा।

गॉसिपिंग ना करें
शब्‍दों को सोच समझ कर इस्‍तेमाल करना चाहिए। आपको जो बात मजाक लगती है वो परिवार के किसी सदस्‍य को व्‍यंग लग सकती है। परिवार के सदस्‍यों का मजाक उड़ाना या उनके बारे में गॉसिपिंग करना बिलकुल गलत है। क्‍योंकि बात परिवार की है तो कभी ना कभी सामने आ ही जायेगी और आपके रिश्‍ते खराब होंगे।

6 बड़ी गल्तियां जो तबाह कर सकती हैं आपके रिश्‍तों को

आपसी समझ बढ़ायें
ये एक आम समस्‍या है, कई बार कहा कुछ जाता है और समझा कुछ और जाता है। कई बार आप कहीं आने जाने या किसी दूसरे मामले में परिवार के शख्‍स के शामिल होने से इंकार को दिल पर लेकर बुरा मान जाते हैं। कई बार इसका उल्‍टा होता है कि कोई सदस्‍य आपको अपने साथ चलने की ऑफर नहीं देता तो आप बुरा मान जाते हैं। दोनों ही मामले आपसी समझ की कमी के हैं। हो सकता है परिवार के उस सदस्‍य के पास उसके कदम की कोई वाजिब वजह हो उसे समझें।   

दुराव छिपाव या झूठ से बचें
परिवार के सदस्‍यों से कुछ छ़पाना हमेशा नुकसानदायक होता है। सच हमेशा सही रास्‍ता होता है इसलिए ना तो बात छुपायें ना ही झूठ बोलें।

मतभेद और विचारों में अंतर को ना समझना
अक्‍सर हम ये मानने से ही इंकार कर देते हैं कि परिवार के कुछ सदस्‍यों से हमारा मतभेद है क्‍योंकि आपके विचारों में अंतर है। इसका नतीजा ये होता है मन में कड़वाहट बढ़ती जाती है औरर वो कड़वाहट आपके अलगाव की वजह बनती है। बेहतर होगा कि आप ये स्‍वीकार करें कि कुछ मुद्दों पर मतभेद है और उन्‍हें सुलझाने और दूर करने का प्रयास करें। इसके लिए सबसे पहले एक दूसरे के स्‍पेस का सम्‍मान करना सीखें।

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माफ करें और माफी मांगे
कोई भी परफेक्‍ट नहीं होता इस बात को स्‍वीकार करते हुए दूसरे की गलतियों पर नाराज होना और अपनी गलतियों को अस्‍वीकार करना छोड़ें। मनमुटाव बढ़ाने की जगह माफ करना और माफी मांगना सीखें। परिवार में हरेक का अपना नजरिया होता है और वो एकदम सही या एकदम गलत नहीं बस आपसे भिन्‍न होता है इसके लिए परिवार से अलग होना ठीक नहीं बल्‍कि एक दूसरे को उसके व्‍यक्‍तित्‍व और सोच के साथ एक्‍सेप्‍ट करना होता है।

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