- शहर में चोरी-छिपे बेचे जा रहे संरक्षित पक्षी

- खाने के लिए शौकीन दे रहे मुंहमांगी कीमत

GORAKHPUR: दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण की सारी कवायदें गोरखपुर में कोई मायने ही नहीं रखतीं. चिडि़या खाने के शौकीनों की डिमांड पर शहर में धड़ल्ले से लालसर, बटेर, हारिल, बोदर, सुरखाब आदि संरक्षित पक्षियों का सौदा हो रहा है. पक्षियों के तस्कर शिकार कर इन दुर्लभ पक्षियों की तस्करी कर रहे हैं और शौकीन लोगों से इनके मांस की मुंहमांगी कीमत वसूल कर रहे हैं. पक्षियों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा कारोबार शहर के अलहदादपुर स्थित मीर शिकार मोहल्ले में चल रहा है. जहां महाराजगंज के जंगलों से लेकर संतकरीबनगर के बखिरा ताल से पक्षियों की सप्लाई हो रही है. दैनिक जागरण आई नेक्स्ट टीम जब दुलर्भ पक्षियों के अवैध कारोबार की पड़ताल करने शहर में निकली तो कई चौंकाने वाले खुलासे हुए.

पैसा दीजिए, चिडि़या लीजिए

संरक्षित पक्षियों के धंधे से जुड़े लोगों से दैनिक जागरण आई नेक्स्ट रिपोर्टर खरीददार बनकर मिला. उनसे बातचीत में खुलासा हुआ कि नेपाल से लेकर बिहार तक से पक्षियों के मांस की तस्करी शहर में हो रही है. ऐसे तो पक्षियों की पकड़ने का काम शिकारी करते हैं, लेकिन इसकी सप्लाई के पीछे कई बड़े नाम शामिल होते हैं. जो बकायदा सेटिंग कर सिर्फ पक्षी ही नहीं बल्कि कछुआ आदि जीवों की भी तस्करी करा रहे हैं. वहीं, कंधों पर पिंजरा टांगकर घूमने वाले भी आपकों पक्षियों का मांस उपलब्ध करा देंगे. बस रेट मुंहमांगा देना होगा.

ठंड में बढ़ती है डिमांड

पक्षी का मांस बेचने वाले एक दुकानदार ने बताया कि ठंड के दिनों में इन पक्षियों की डिमांड काफी बढ़ जाती है. क्योंकि माना जाता है कि इन पक्षियों का मांस बेहद गर्म होता है. जो अस्थमा, दमा व सांस की बीमारी आदि में बेहद फायदेमंद बताया जाता है. जबकि शौकीन अपने शौक में इनका मांस खा रहे हैं. मीर शिकार मोहल्ले में पक्षियों के एक कारोबारी ने बताया कि ठंड शुरू होते ही पक्षियों की डिमांड होने लगती है. ऐसे में हम लोग लालसर, बटेर, हारिल, बोदर, सुरखाब जैसी चिडि़यां आसानी से उपलब्ध करा देते हैं. इन पक्षियों के दाम की बात की जाए तो कीमत एक हजार रुपए से लेकर तीन हजार रुपए तक होती है.

रोजाना लाखों का कारोबार

सूत्रों के मुताबिक गर्मी के दिनों में तो सिर्फ ऑर्डर पर ही खाने वाले पक्षियों की खरीद-फरोख्त की जाती है. जबकि ठंड के दिनों में बढ़ती डिमांड को देखते हुए पहले से ही स्टॉक उपलब्ध किया जाता है. हालांकि यह कारोबार बेहद चोरी-छिपे ही चलता है. बावजूद इसके शहर भर में रोजना लाखों रुपए से अधिक के अवैध पक्षियों का कारोबार चल रहा है. हैरानी वाली बात तो ये कि पक्षियों के शिकार से लेकर पक्षियों के मांस की बिक्री तक पर वन विभाग कोई सुध तक नहीं लेता. जबकि इसका कारोबार या पक्षियों को मारकर खाना भी अपराध की श्रेणी में आता है.

तीन साल की सजा, पांच हजार तक जुर्माना

वन्य जीव अधिनियम 1972 के तहत पशु-पक्षियों का व्यवसाय नहीं किया जा सकता है. उन्हें कैद करना भी अपराध है. अगर कोई इसका व्यवसाय करते हुए पकड़े जाते हैं तो आरोपी के लिए सजा का प्रावधान है. इसमें उसे तीन साल की सजा और तीन हजार से लेकर पांच हजार तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है. जबकि पक्षियों को किसी भी हाल में पिंजरे में कैद नहीं रखा जा सकता है और न ही उनका व्यवसाय किया जा सकता है. यह नयमों के विरुद्ध है. कौआ को छोड़कर सभी पक्षी संरक्षित हैं. राष्ट्रीय पक्षी मोर को मारने पर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है.