ज़ाहिर है वह एक मज़बूत औरत हैं लेकिन जब उन्होंने शादी किए बग़ैर मां बनने का फ़ैसला किया तो यह उनके लिए आसान नहीं था।

एक अकेली मां का संघर्ष उसके बाद शुरू हुआ। बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने निरुशा निख़त से बात की। इस फैसले के बाद कैसे तय किया उन्होंने अपना रास्ता, सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी।
निरुशा निख़त की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी
बड़ा फ़ैसला
मैं बिन ब्याही माँ हूँ और खुश हूँ
यह 2005 की बात है। मैं लिव इन रिलेशनशिप में थी और मुझे नहीं लगता था कि यह संबंध जारी रहेगा। लेकिन जब मैं गर्भवती हो गई तो मुझे गर्भपात करवाना भी सही नहीं लगा, यह मेरे ज़मीर को गवारा नहीं था।

आपने एक संबंध बनाया है, तो उसके ज़िम्मेदार आप हैं, इसमें उस बच्चे का कोई कुसूर नहीं है।

यह भी सच था कि मेरी कुछ ज़िम्मेदारियां थीं, मुझे अपनी ज़िंदगी के कुछ फ़ैसले करने थे, उस वक्त मेरी माली हालत भी बहुत अच्छी नहीं थी, मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं कभी सैटल हो पाऊंगी या नहीं- या होना चाहूंगी या नहीं।

फिर चूंकि मैं एक निम्न मध्य वर्गीय मुस्लिम परिवार से हूं, इसलिए यह फ़ैसला मेरे लिए आसान नहीं बहुत ही बड़ा फ़ैसला था।
परिवार
मैं बिन ब्याही माँ हूँ और खुश हूँ
इस बारे में मैंने अपने परिवार को भी बताया और मैं खुद को बहुत-बहुत ख़ुशकिस्मत लड़कियों में से एक मानती हूं कि मेरा परिवार हमेशा मेरे साथ रहा भले ही उस वक्त नहीं रहा।

गर्भावस्था के दौरान मैं बिल्कुल अकेली थी। मेरे साथ एक नौकर भी नहीं था।

मेरी हालत ऐसी थी कि मैं बच्चा पैदा करने के लिए खुद चलकर गई, अपने डिलीवरी फ़ॉर्म पर मैंने ख़ुद हस्ताक्षर किए और बच्चा लेकर अकेले वापस आई।

हालांकि मेरी मां ने तो इस बात को उसी समय स्वीकार कर लिया था, लेकिन हालात ऐसे थे कि वह मेरे साथ नहीं आ पाईं क्योंकि मेरे पिता इससे नाराज़ थे, उनके लिए यह इज़्ज़त का सवाल था।

मां के लिए बड़ा धर्मसंकट था कि पति का साथ दें या बेटी का लेकिन बच्चा होने के बाद धीरे-धीरे सब ठीक हो गया।
ज़िम्मेदार मां ही काफ़ी
मैं बिन ब्याही माँ हूँ और खुश हूँ
मुझे कभी नहीं लगा कि मां बनने के लिए आपको एक पति की ज़रूरत होती है। यह बात ठीक है कि एक बच्चे का अधिकार होता है कि उसका बाप भी हो, होना भी चाहिए।

लेकिन अगर आपने शादी के बाद बच्चा पैदा किया लेकिन जो उसका कानूनी पिता है अगर उससे उसे वह हक़ और प्यार नहीं मिलता है जिसका वह हक़दार है तो??

मैंने ऐसी बहुत सी शादियां देखी हैं जिनमें पिता वैसा नहीं है जैसा उसे होना चाहिए था। उस रिश्ते में भी बच्चे को वह सारी चीज़ें नहीं मिलतीं जो एक पिता से मिलनी चाहिए।

ऐसे में अगर एक मां के अंदर यह सलीका है और यह हिम्मत है कि कि वह बच्चे की मां और बाप दोनों हो सकती है तो क्यों न हो।

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