पढ़ाई और परिवार की उम्मीदों को पूरा करने के अलावा भी अवसाद के कई ऐसे कारण हैं जो भारतीय छात्रों को एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा देते हैं जिनसे बाहर आना उनके लिए एक बेहद तनावपूर्ण प्रक्रिया बन कर रह जाती है।

एक मध्यम-वर्गीय परिवार के कार्तिके शर्मा ने देश से बाहर जा कर पढ़ाई करने की बात सपने में भी नहीं सोची थी, लेकिन उन्हें ये सपना दिखाया, दिल्ली में हुए एजुकेशन फ़ेयर में बैठे एक ब्रितानी कॉलेज के प्रबंधकों ने। कार्तिके को बताया गया कि ब्रिटेन में जा कर पढ़ाई करना और वहां के रहन सहन में ख़ुद को ढालना एक आसान काम होगा।

कार्तिके ने बताया, “प्रबंधकों ने अपने कॉलेज की ओर मुझे आकर्षित करने की पूरी कोशिश की और मज़े की बात है कि मैं उनके दिए तर्क से मिनटों में संतुष्ट हो गया। मुझे बताया गया कि मुझे अपनी कॉलेज फ़ीस की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि मैं पढ़ाई के साथ साथ नौकरी कर अपना खर्च निकाल सकता हूं। मेरे पिता ने मुझे केवल पहली तिमाही की ट्यूशन फ़ीस के पैसे दिए और मैं एक नई ज़िंदगी के लिए ब्रिटेन के लिए रवाना हो गया.”

कुचक्र का शिकार

ब्रिटेन जा कर कार्तिके ने ख़ुद को एक मंझधार में पाया। ब्रिटेन में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कार्तिके बताते हैं, “वहां जा कर पाया कि ब्रिटेन में रहना इतना आसान नहीं, जितना मुझे बताया गया था। मुझे छह महीने तक कोई नौकरी नहीं मिली और मेरे सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे।

मां-बाप से बार-बार पैसा मांगने में मुझे बहुत ग्लानि होती थी। जब नौकरी मिली, तो उससे मिलने वाला पैसा भी कभी मेरी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाया क्योंकि ब्रिटेन में खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक बहुत महंगा है। हालांकि छात्रों को हफ़्ते में केवल 20 घंटे काम करने की इजाज़त होती है, लेकिन मैं हफ़्ते में 80 घंटे काम करने के बावजूद अपना ख़र्च नहीं उठा पा रहा था। इस चक्कर में मेरा पढ़ाई पर से ध्यान तो हटा ही, साथ ही मैं मानसिक तनाव का शिकार होता चला गया.”

भारत से ब्रिटेन जाने वाले ज़्यादातर भारतीय छात्र इसी कुचक्र का शिकार हो जाते हैं, और हाल ही में सामने आई ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ़ साइकेट्रिस्ट की एक रिपोर्ट भी इन्हीं आशंकाओं को ज़ाहिर करती है। रिपोर्ट में सामने आया है कि ब्रिटेन में बाहर से आने वाले छात्र स्थानीय छात्रों के मुकाबले ज़्यादा डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

एक तरफ़ तो मां-बाप की अपेक्षाओं को पूरा करने का दबाव उन पर बना रहता है और दूसरी तरफ़ वे ब्रिटेन की जीवनशैली और संस्कृति को अपनाने की प्रक्रिया में अपने जीवन में कई वित्तीय बदलाव लाने की कोशिश करते हैं, जिसका असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ता है।

मुंबई से ब्रिटेन पढ़ाई करने गई प्रीति जॉन का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। प्रीती ने बताया, “बाहरी देशों में पढ़ाई का तनाव, घर से दूर रहने का तनाव और अकेलापन छात्रों को अंदर से खोखला बना देता है। जैसे कि ये सब काफ़ी नहीं है कि वहां रहने का ख़र्च भी अपने आप में ही तनाव का सबसे बड़ा कारण बन जाता है।


ऐसा नहीं है कि मेरे मां-बाप के पास पैसे की कोई कमी है, लेकिन भारतीय मुद्रा के हिसाब से देखा जाए, तो चाहे घर से कितने ही रुपए आ जाएं, पाउंड के मुकाबले वो कम ही पड़ते हैं। जो भी मेरे मां-बाप मेरे ख़र्च के लिए भेजते थे, वो हमेशा समय से पहले ही ख़त्म हो जाता था, लेकिन मैं ग्लानि की वजह से उनसे वक्त से पहले पैसा नहीं मांगती थी.”

इच्छाओं को दबाना

कार्तिके और प्रीति परिवार से पैसा न मांग कर अपनी इच्छाओं को दबाना ज़्यादा बेहतर समझा। प्रीति जॉन ने चार दिनों तक केवल बिस्कुट खाकर अपनी भूख़ मिटाई।

“मेरे पैसे ख़त्म हो गए थे और मैं मां-बाप को अपनी मांगों से परेशान नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने चार दिन सिर्फ़ बिस्कुट खा कर काटे। मुझे बहुत बुरा लगा था, लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी? एक वक्त के खाने के लिए पांच पाउंड ख़र्च करना एक बड़ी बात है और मैं वो नहीं कर सकती थी। मैंने ख़ुद को चार दिनों तक कमरे में बंद रखा ताकि मेरे दोस्तों को न पता चले कि मैं बिस्कुट खा कर काम चला रही हूं.”

वित्तीय दबाव ही छात्रों के डिप्रेशन की अकेली जड़ नहीं है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि ब्रिटेन में स्थानीय छात्रों के बीच शराब पीने का चलन बेहद आम है जिससे कि वो बाहरी छात्र ख़ुद को अलग थलग महसूस करते हैं, जो ऐसी जीवनशैली के आदी न हों।

कार्तिके ने बताया, “ब्रिटेन के युवाओं को बेवजह शराब पीने की आदत है। तो ऐसे में हर दूसरे दिन कोई न कोई आपको पब जाने के लिए कहता है और अगर आप मना कर देते हैं तो आपको पूरी तरह अकेला महसूस करवाया जाता है। ये अकेलापन भी कभी कभी अवसाद की जड़ हो जाता है। कई छात्र इस अकेलेपन को मिटाने के लिए शराब पीना शुरू कर देते हैं और जो ऐसा नहीं कर पाते, वो स्वदेश लौट जाते हैं.”

विश्विद्यालयों की ज़िम्मेदारी

ब्रिटेन में युवाओं के मानसिक स्वास्थय के लिए काम करने वाली संस्था यंग माइंड्स का कहना है कि इस स्थिति के पीछे विश्वविद्यालय ही ज़िम्मेदार हैं, जो छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ में उन्हें आधा सच ही बताते हैं।

संस्था के प्रवक्ता क्रिस्टोफ़र लीमन ने कहा, “मुझे लगता है कि विश्विद्यालयों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण ऐसा हो रहा है। ऐसे विश्वविद्यालय किसी भी तरह छात्रों को ब्रिटेन की ओर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश करते हैं। लेकिन इस पूरे खेल में वो ये भूल जाते हैं कि इन छात्रों को ब्रिटेन की जीवनशैली और वहां रहने के खर्च के बारे में भी अवगत करवाना भी उनकी ज़िम्मेदारी बनती है.”

ब्रिटेन कॉलेज ऑफ़ साइकियेट्रिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि ब्रिटेन के कॉलेजों को काउंसेलिंग पर ज़्यादा खर्च करना चाहिए। लेकिन एक महत्तवपूर्ण बात जो इस रिपोर्ट में नहीं कही गई है, वो ये है कि ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में जाने से पहले ही बाहरी छात्रों को ज़मीनी सच्चाइयों से अवगत करवाना ज़रूरी है।

भारत से ब्रिटेन जाने वाले कार्तिके और प्रीति जैसे हज़ारों छात्रों को अगर सही सलाह दी जाए, तो उन्हें इस चक्रव्यूह में फंसने से बचाया जा सकता है।

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