--डैम पर स्वामित्व को लेकर झारखंड और पश्चिम बंगाल सरकार में विवाद

-35 किमी दूर झारखंड की सड़क पर पश्चिम बंगाल सरकार ने लगाया बोर्ड

-10 साल पहले ही पश्चिम बंगाल सरकार का करार हो चुका है खत्म

-144 मौजा के विस्थापित परिवारों को नहीं मिला है पूरा मुआवजा

रांची : दुमका के मसानजोर डैम के स्वामित्व को लेकर उत्पन्न ऊहापोह थमने का नाम नहीं ले रहा. दुमका की विधायक सह कल्याण, महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग की मंत्री डा. लुइस मरांडी द्वारा मसानजोर की ओर नजर उठाने वाले की आंख निकाल लेने के बयान के बाद राजनीति तेज हो गई है. कल्याण मंत्री की तल्खी अब भी बरकरार है. मंगलवार को मीडिया से मुखातिब डा. लुइस ने दो टूक कहा कि अगर मसानजोर डैम पश्चिम बंगाल की संपत्ति है तो वह इससे संबंधित डीड सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहा? उन्होंने यह भी संकेत दिया कि करार की अवधि लगभग दशक भर पूर्व ही समाप्त हो गई है. यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल डैम पर अपनी दावेदारी कर रहा है, परंतु झारखंड की सड़क तो उसकी नहीं है, फिर अपनी सीमा क्षेत्र से 30-35 किलोमीटर दूर झारखंड की सड़क पर उसने किस हैसियत से पश्चिम बंगाल सरकार का बोर्ड लगाया.

मंत्री ने कहा कि रानेश्वर प्रखंड के भ्रमण के दौरान मैंने पश्चिम बंगाल सरकार के रंग में डैम की रंगाई और झारखंड की सड़क पर पश्चिम बंगाल सरकार का बोर्ड (वेलकम टू मसानजोर) देखा. अब अगर बिना अनुमति के कोई किसी के घर में प्रवेश करेगा तो सवाल उठेगा ही. सवाल डैम की वजह से विस्थापित होने वाले 144 मौजों के परिवारों का है. आज उन परिवारों की पहचान खो गई है. स्थानीय जन प्रतिनिधि होने के नाते मैं मसानजोर का मामला बहुत पहले से उठाती रही हूं और जबतक मामले का निपटारा नहीं हो जाता, उठाती रहूंगी. सवाल यह भी कि 1955 के आसपास अविभाजित बिहार में यह डैम अस्तित्व में आया, फिर पश्चिम बंगाल की जगह यह बिहार का क्यों नहीं हुआ? उन्होंने मसानजोर की मौजूदा परिस्थितियों से मुख्यमंत्री को भी अवगत करा दिया है.

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