आगरा. प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के अंतर्गत आम नागरिकों को बाजार से 60 से 70 फीसदी कम कीमत पर दवाइंया मुहैया कराने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा देशभर में एक हजार से ज्यादा जन औषधि केन्द्र खोले जा रहे है. जिनमें से तीन औषधि केन्द्र जनपद आगरा के जिला चिकित्सालय, जिला महिला चिकित्सालय व मानसिक चिकित्सालय में खोले जाएंगे. इन केन्द्रो की शुरूआत रविवार को मुख्य चिकित्सा अधिकारी मुकेश कुमार वत्स द्वारा की जाएगी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जन औषधि योजना एक जुलाई 2015 को की गई थी. इस योजना द्वारा सरकार द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली जेनरिक दवाइंयो के दाम बाजार मूल्य से कम किए गए है.

ब्रांडेड और फार्मा से सस्ती होती है दवाइंया

सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही जेनरिक दवाइयां ब्रांडेड और फार्मा की दवाइयों से कम रेट पर आम नागरिको को मिलती है. जबकि उनका असर अन्य दवाइयों के मुकाबले ही रहता है.

जनता को जागरूक करने के लिए शुरू की गई थी योजना

प्रधानमंत्री द्वारा जन औषधि अभियान की शुरूआत जनता को जागरूक करने के उद्देश्य से की गई थी. ताकि जनता को बताया जा सके कि ब्रांडेड मेडिसिन की तुलना में जेनेरिक मेडिसिन कम मूल्य पर उपलब्ध है. साथ ही इसकी क्वालिटी में किसी तरह की कमी नही है और यह जेनेरिक दवाइयां मार्केट में उपलब्ध है जिन्हे आसानी से खरीदा जा सकता है.

सौ केन्द्रो पर होगा शुभारंभ

प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्रो का उद्घघाटन उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद से 100 प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्रो का उद्घघाटन किया जाएगा. जिनमें से तीन केन्द्र आगरा जनपद में खोला जाना तय हुआ है.

क्या होती है जेनेरिक दवाएं

किसी एक बीमारी के इलाज के लिए तमाम तरह की रिसर्च और स्टडी के बाद एक रसायन (साल्ट) तैयार किया जाता है जिसे आसानी से उपलब्ध करवाने के लिए दवा की शक्ल दे दी जाती है. इस साल्ट को हर कंपनी अलग-अलग नामों से बेचती है. कोई इसे महंगे दामों में बेचती है तो कोई सस्ते. लेकिन इस साल्ट का जेनेरिक नाम साल्ट के कंपोजिशन और बीमारी का ध्यान रखते हुए एक विशेष समिति द्वारा निर्धारित किया जाता है. किसी भी साल्ट का जेनेरिक नाम पूरी दुनिया में एक ही रहता है.

गरीब खरीदते है महंगी दवाएं

अधिकत्तर बड़े शहरों में एक्सक्लुसिव जेनेरिक मेडिकल स्टोर होते हैं, लेकिन इनका ठीक से प्रचार-प्रसार ना होने के कारण इसका लाभ लोगों को नहीं मिल पाता. मजूबरी में ठीक जानकारी ना होने के कारण गरीब भी केमिस्ट से महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर हो जाता है.