- 35 मिनी ट्रैक की खरीदी गई थी चेचिस

- 12 से 16 लाख एक चेचिस की कीमत

- 6 करोड़ से खरीदी गई चेचिस

- 1600 प्रदेश भर में फायर टेंडर गाडि़यां

- 500 बड़े फायर टेंडर (गाडि़यां)

- 08 लखनऊ में फायर स्टेशन -

- 27 (बड़े और छोटे) लखनऊ में फायर ब्रिगेड

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LUCKNOW : एक तरफ पूरे प्रदेश में फायर ब्रिगेड संसाधन के अभाव से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ करोड़ खर्च कर फायर ब्रिगेड के लिए खरीदी गई ट्रैक की चेचिस धूल फांक रही हैं. अफसरों की अनदेखी के चलते दो साल पहले खरीदी गई 35 गाडि़यों की चेचिस न अब चलने लायक बचीं और ना ही उन्हें मॉडीफाई कर फायर ब्रिगेड का रूप दिया जा सकता है. आलम यह है कि चौक और पीजीआई में खड़ी इन ट्रैक की चेचिस में जंग और पेड़ों ने अपना ठिकाना बना लिया है.

35 गाडि़यों की चेचिस खरीदी गई थी

आग की आपदा से लोगों को बचाने के लिए फायर ब्रिगेड की कमी के चलते करीब दो साल पहले वर्ष 2016 में ट्रैक की 35 चेचिस खरीदी गई थी. हर एक चेचिस की कीमत करीब 12 से 16 लाख रुपये बतायी जा रही है. करीब छह करोड़ रुपये खर्च करके खरीदी गई चेचिस पर फायर ब्रिगेड की बॉडी बनाई जानी थी. इन गाडि़यों को लखनऊ और आस-पास के जिलों को आवंटित किया जाना था.

बजट को दूसरे मदों पर कर दिया खर्च

शासन से इन गाडि़यों को मॉडीफाई करने के लिए जो बजट आया था. उसे अफसरों ने दूसरे मदों पर खर्च कर दिया. फायर टेंडर बनाने के लिए आए बजट को अधिकारियों ने लाइफ सेव जैकेट, नाइट विजन कैमरा, फायर सेफ्टी सूट खरीदने में खर्च कर दिया. यहीं नहीं बाकी बचा पैसा नेशनल फायर सर्विस गेम पर खर्च कर दिया गया. ऐसे में करोड़ों की कीमत से खरीदी गई चेचिस जंग खा रही है.

इंजन हुए खराब बॉडी में लगा जंग

चौक और पीजीआई फायर स्टेशन में खड़ी चेचिस को चेक किया गया तो दर्जन भर से ज्यादा गाडि़यों के इंजन खराब मिले. तकनीकी खराबी के चलते यह स्टार्ट नहीं हुई. इसकी जानकारी निदेशालय के अफसरों का दी गई तब उन्हें ध्यान आया कि बॉडी बनवाकर गाडि़यों को जिलों के फायर स्टेशनों को आवंटित किया जाना है. दो साल से लापरवाही बरतने वाले अफसरों ने आनन फानन में लेटर भेजकर शासन से बजट की मांग की है. ज्यादातर चेचिस में जंग लग चुका है और बॉडी में पेड़ तक उग आए हैं.

रेट बढ़ने पर बजट करना पड़ा वापस

फायर सर्विस के सूत्रों का कहना है कि चेचिस की खरीदारी के बाद अफसरों ने बॉडी मेकिंग के लिए टेंडर भी डाला गया था. बॉडी मेकिंग के दामों में बढ़ोत्तरी और विभाग के कम शेड्यूल रेट के चलते टेंडर प्रक्रिया फेल साबित हुई. ऐसे में इस साल भी बाडी बनवाने के लिए शासन से 5.25 करोड़ रुपये मिले थे, जिसे अधिकारियों ने वापस कर दिया.