2001 में संसद भवन पर हमला करने के दोषी मोहम्मद अफजल गुरू की फांसी के मुद्दे पर तत्कालीन प्रेसीडेंट डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और कांग्रेस प्रेसीडेंट सोनिया गांधी के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए थे. बता दें कि कि कलाम को 2004 तक देश की सत्ता पर काबिज रही एनडीए ने प्रेसीडेंट पोस्ट का कैंडीडेट बनाया था, बाद में कांग्रेस ने उन्हें अपना सपोर्ट दिया था.

2006 में नई दिल्ली में अमेरिकन एंबेसी की तरफ से वॉशिंगटन भेजे गए सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स में इस बात का जिक्र है. यह खुलासा वेबसाइट विकीलीक्स ने किया है. विकीलीक्स की तरफ से जारी केबल्स में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे दिल्ली से लेकर कश्मीर तक अफजल सियासत का सवाल बन गया.

जब की माफी की सिफारिश

खबरों के हवाले से इन डॉक्यूमेंट्स में कहा गया है कि सोनिया की ही पार्टी, कांग्रेस के लीडर व जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन सीएम गुलाम नबी आजाद ने अफजल गुरू को माफ किए जाने की सिफारिश की थी. कलाम और सोनिया के बीच अफजल गुरू के मामले में मतभेद की एक बड़ी वजह यही थी. 20 अक्टूबर, 2006 को अमेरिकन एंबेसी के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन जैफ्री पैट ने सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स (82638) में यह भी कहा था कि अगर प्रेसीडेंट कलाम को लगता है कि सोनिया उन्हें दोबारा प्रेसीडेंट नहीं बनने देंगी तो वे अफजल गुरू के इश्यू को सही समय पर उछाल भी सकते हैं.

Vote Bank का डर

डॉक्यूमेंट्स में अफजल गुरू को लेकर 2007 के उत्तर प्रदेश एसेंबली इलेक्शन से पहले कांग्रेस के चुनावी असमंजस की बात भी बताई गई है. डॉक्यूमेंट्स में पार्टी के ही एक लीडर (नाम नहीं बताया गया है) के हवाले से कहा गया है कि अगर यूपीए अफजल की फांसी की सजा माफ करती है तो बीजेपी कांग्रेस को नेशनल सिक्योरिटी के मुद्दे पर कमजोर होने का आरोप लगा सकती है. वहीं, अगर यूपीए अफजल गुरू को फांसी की सजा होने देती है तो इस बात का डर है कि माइनॉरिटी मुस्लिम वोट बैंक जो नेशनल लेवल पर परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है, छूट जाएगा.

कश्मीर तक गूंजा मामला

डॉक्यूमेंट्स में जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन यासिन मलिक का भी जिक्र है. यासिन का मानना था कि कश्मीर के बहुत से लोग अफजल के साथ हमदर्दी रखते हैं और उनका मानना है कि अफजल ने कोई बहुत बड़ा क्राइम नहीं किया है. उसका गुनाह सिर्फ इतना है कि उसने संसद पर अटैक करने वाले हमलावरों के लिए कार का अरेंजमेंट किया था.

गौरतलब है कि हमले में जिस अंबेसडर कार का यूज टेररिस्ट्स ने किया था उसे अफजल ने ही मुहैया कराया था. यासिन ने ये सारी बातें कांसुलेट पॉलिटकल अफसर से कही थीं. उनका मानना था कि सिर्फ कार प्रोवाइड कराना भर से अफजल को मौत की सजा कैसे दी जा सकती है. घाटी के एक अलगाववादी लीडर का मानना था कि इस मामले पर जितना हो सके चुप ही रहना चाहिए. उन्हें नहीं लगता कि भारतीयों को अफजल को माफ कर देना चाहिए. इसके मुताबिक हुर्रियत इस मामले को उठाना बेहतर नहीं समझती क्योंकि उन्हें डर है कि टेररिस्ट्स घाटी में इस मुद्दे के जरिए अपना मकसद पूरा करने में सफल हो सकते हैं.