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up election results 2017: यूपी में बीजेपी के सामने बीएसपी की हार के ये हैं कारण,मायावती बोलीं ईवीएम फिक्‍स

हार से पसरा सन्‍नाटा  
लोकसभा चुनाव में खाता भी ना खोल पाने वाली बहुजन समाज पार्टी के लिए हालिया विधानसभा चुनाव भी बेहद खराब साबित हुआ है। कहना गलत न होगा कि यह बसपा के लिए सबसे बुरे दौर की शुरुआत है। उसका वोट बैंक तेजी से खिसकता जा रहा है या फिर वह जिताऊ नहीं बचा है। मुस्लिम-दलित वोट बैंक में थोड़ा सा सोशल इंजीनियरिंग का तड़का लगाकर पार्टी ने जो चुनावी खिचड़ी बनाने की तैयारी की थी वह बेस्वाद साबित हुई है। इस चुनाव के बाद बसपा के तमाम बड़े चेहरों के लिए अब राज्यसभा की चौखट को पार कर पाना भी मुश्किल होगा। वहीं उसका राष्ट्रीय पार्टी का तमगा भी जल्द ही छिनने के आसार भी पैदा हो चुके है। इसकी असल वजह उसके बड़े नेताओं का बागी होना और पार्टी सुप्रीमो पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप माने जा रहे है।
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लगातार होता रहा नुकसान
इसे लोकतंत्र की खूबी ही माना जाएगा कि जनता तेजी के साथ अपना मूड बदलती जा रही है। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि दस साल पहले सूबे में बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा को हालिया चुनाव में इस कदर गहरा नुकसान होगा और वह 1991 में किए गये अपने प्रदर्शन के करीब पहुंच जाएगी जब उसे महज 11 सीटें मिली थी। दरअसल चुनाव से पहले बसपा के तमाम विधायक टूटकर भाजपा, सपा और कांग्रेस में चले गये। स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, नंद गोपाल नंदी, आरके चौधरी जैसे नेताओं का पार्टी से जाना नुकसानदायक साबित हुआ। तमाम नेताओं ने मायावती से मुंह मोडऩे के साथ उन पर टिकट बेचने के गंभीर आरोप भी लगाए जिनका असर आम जनता में खासा हुआ। मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर उसने अपने दलित वोट बैंक को नाराज कर लिया। वहीं भाजपा ने इसके जवाब में ट्रिपल तलाक का मुद्दा छेड़कर मुस्लिम वोट बैंक में ही फूट डाल दी। वहीं सपा भी काफी हद तक मुस्लिम वोट को बसपा के पाले में जाने से रोकती रही. चुनावी जानकारों की माने तो मुस्लिम वोट बैंक बसपा और सपा में बराबर बंट गया. वहीं मायावती अपनी रैलियों में लगातार नोटबंदी को मुद्दा बनाती रहीं जो गरीबों को रास नही आया। इससे पार्टी की इमेज को धक्का पहुंचा और उम्मीद के मुताबिक उसके वोट बैंक में कोई खास इजाफा देखने को नहीं मिला।

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करोड़पतियों को टिकट देना बेकार
चुनाव नतीजों से यह भी साबित हो गया कि बसपा द्वारा करोड़पति उम्मीदवारों को टिकट देना निरर्थक साबित हुआ। मालूम हो कि चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विधानसभा चुनाव में अमीरों को टिकट देने में बसपा सबसे आगे है। वहीं उसके प्रत्याशियों में ज्यादातर ठेकेदार, प्रापर्टी डीलर इत्यादि हैं। इसे जमीनी नेताओं की कमी माना जाए या फिर पार्टी पर लगे आरोपों के मुताबिक टिकट बेचे जाने से उपजी बदनामी, पार्टी को सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। इसमें यदि मायावती और उनके करीबी परिजनों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भी जोड़ दिया जाए तो जनता के बदले मूड का अंदाजा लगाना आसान हो जाता है। फिलहाल इन नतीजों ने बसपा के रणनीतिकारों के हौसले तोड़ दिए हैं और उन्हें अब नई सोच के साथ फिर से संगठन को मजबूत बनाना होगा।
हारते हारते पहना जीत का हार कोई 193 वोट से जीता तो कोई 432 से

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चुनाव नतीजों में बसपा का सिलसिले वार लेखा जोखा

1991 - 12

1993 - 67

1996 - 67

2002 - 98

2007 - 206

2012 - 80

2017- 19

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ईवीएम में गड़बड़ी की दुहाई दे की चुनाव रद्द कराने की मांग
बसपा सुप्रीमो मायावती ने चुनाव नतीजे आने के बाद अचानक दोपहर में प्रेस कांफ्रेस बुलाकर अपनी हार के लिए ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी को जिम्मेदार ठहरा डाला। मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को खुली चुनौती भी दे डाली कि यदि उनमें थोड़ी भी ईमानदारी बची है तो वे दोबारा पुरानी बैलेट पद्धति से चुनाव लड़ें और जीत कर दिखा दें। अपने आरोपों को बल देने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में की गयी इस तरह की शिकायत और कुछ दिन पहले उनकी प्रेस कांफ्रेस में एक पत्रकार द्वारा ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की आशंका को लेकर पूछे गये सवाल को आधार बनाया। उन्होंने इस मुद्दे पर पूरे विपक्ष को भी अपने साथ जोडऩे का प्रयास करते हुए कहा कि वे भी चुनाव नतीजों से हैरान है. खुला आरोप लगाया कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी भाजपा प्रत्याशियों का जीतना इसका उदाहरण है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया। साथ ही दावा किया कि जनता का भरोसा ईवीएम से उठ चुका है। कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ईवीएम में गड़बड़ी कर जीती थी जिस बारे में चुनाव आयोग से शिकायत भी की गयी थी। कहा कि लोगों ने बसपा को वोट देने के लिए ईवीएम का बटन दबाया लेकिन वह गड़बड़ी की वजह से भाजपा को चला गया।

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