- विवेचनाओं के लंबित रहने पर हाईकोर्ट की नाराजगी के बाद गृह विभाग ने वित्त विभाग को भेजा 157 करोड़ का प्रस्ताव

- कोर्ट ने मॉनीटरिंग के लिये बनी इंपॉवर्ड कमेटी में कोर्ट के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने का दिया आदेश

- वित्त विभाग की मंजूरी के बाद कैबिनेट के समक्ष पेश होगा प्रस्ताव

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LUCKNOW: धनाभाव के चलते विवेचनाओं के लंबित रहने की स्थिति में सुधार की उम्मीद बंधी है. अब विवेचनाओं को समय से पूरा करने में आड़े आने वाली धन की समस्या को दूर करने के लिये प्रदेश सरकार विवेचना कोष बनाएगी. हाईकोर्ट द्वारा नाराजगी जताने पर गृह विभाग ने 157 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाकर वित्त विभाग को भेजा है. वित्त विभाग से मंजूरी मिलने के बाद इसे कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा.

अपराधी उठाते हैं लाभ

प्रदेश के थानों में दर्ज होने वाले मुकदमों की विवेचना इंस्पेक्टर व सब इंस्पेक्टर के जिम्मे होती है. इन मुकदमों की विवेचना के दौरान तमाम साक्ष्य जुटाने के लिये इन इंस्पेक्टर्स व सब इंस्पेक्टर्स को रकम की जरूरत होती है. पर, अब तक विवेचना की मद में खर्च करने के लिये शासन की ओर से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. लिहाजा, इसका असर विवेचना पर पड़ता है और वह लंबी खिंचती है. विवेचना के ज्यादा समय तक लंबित रहने की वजह से इन मुकदमों में अरेस्ट किये गए अपराधियों को कानूनी लाभ मिल जाता है. पुलिस विभाग के सूत्रों के मुताबिक, हर वक्त प्रदेश भर में करीब दो से ढाई लाख विवेचनाएं पेंडिंग रहती हैं.

हाईकोर्ट की सख्ती से हरकत में शासन

प्रदेश भर में लंबित विवेचनाओं की भारी तादाद और उसकी वजह से अपराधियों को मिलने वाले लाभ को देखते हुए हाईकोर्ट ने बीते दिनों सख्त नाराजगी जताई थी और विवेचना के लिये अलग से कोष बनाने का आदेश दिया था. अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही ने बताया कि कोर्ट के आदेशानुसार यूपी पुलिस की टेक्निकल सर्विसेज ने पूरे प्रदेश से डाटा कलेक्ट किया और गृह विभाग को इस कोष के लिये 157 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार कर भेजा है. गृह विभाग ने इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिये वित्त विभाग को भेज दिया. अपर महाधिवक्ता शाही ने बताया कि वित्त विभाग से मंजूरी मिलने के बाद इस प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा.

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इंपावर्ड कमेटी में होंगे कोर्ट के प्रतिनिधि

अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही ने बताया कि कोर्ट ने निर्देश दिया कि इतनी बड़ी रकम के खर्च की मॉनीटरिंग को लेकर सवाल उठाए गए थे. जिस पर गृह विभाग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सीसीटीएनएस के तहत सभी जिलों व प्रदेश स्तर पर निगरानी के लिये इंपावर्ड कमेटी पहले से गठित है. इस पर कोर्ट ने कहा कि चूंकि मामला विवेचनाओं से संबंधित है लिहाजा स्टेट इंपावर्ड कमेटी में कम से कम एक अपर महाधिवक्ता व दो अपर शासकीय अधिवक्ताओं को शामिल किया जाए. गृह विभाग की ओर से बताया गया कि इंपावर्ड कमेटी केंद्र सरकार द्वारा तय नियमों से बनी है. इस पर कोर्ट ने इन प्रतिनिधियों को भी कमेटी में शामिल करने के लिये केंद्र को प्रस्ताव भेजने का निर्देश दिया.