मुंबई(ब्यूरो)। आपकी बैक टू बैक खेल आधारित फिल्में आ रही हैं?
'मुक्काबाज' में बॉक्सिंग के अलावा भी कई मुद्दे थे। उसमें किरदार में कई लेयर थे। 'गोल्ड' में स्वतंत्र भारत के तौर पर ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के गोल्ड जीतने के अलावा संदेश भी निहित है। यह देशभक्ति की भावना से सरोबार कर देती है। इसे सिर्फ खेल आधारित फिल्म नहीं कह सकते, इसमें ड्रामा भी है। स्कि्रप्ट पढ़ने के बाद मेरी फीलिंग यह थी कि पांच फिल्में छोड़नी पड़ें तो छोड़ दूंगा, मगर इसे करूंगा। इतनी सशक्त कहानी है। 
खेल आधारित सिनेमा के क्या फायदे मानते हैं? 
स्वास्थ्य से खेल का सीधा संबंध है। खेलने से फिटनेस कायम रहती है। खिलाड़ी अपने लक्ष्य को फोकस रहते हैं। उनकी सोच बहुत पॉजिटिव होती है। कहते हैं, जहां के मैदान भरे होते हैं, वहां के अस्पताल खाली होते हैं। फिल्म के जरिये आप करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। क्या पता खेल आधारित फिल्म किसी बच्चे की भावनाओं को छू जाए। वह जिंदगी में कुछ असाधारण करने की ठान ले। 'मुक्काबाज' के बाद कई खिलाडि़यों ने मुझसे कहा कि मैंने हार मान ली थी। फिल्म देखने के बाद मैंने दोबारा कोशिश आरंभ की। खेल आधारित फिल्में आपको लगातार कोशिश करने को प्रेरित करती हैं। 

'गोल्ड' की शूटिंग का सबसे यादगार लम्हा..
हॉकी पर और भी फिल्में अतीत में बनी हैं। 'गोल्ड' उनसे कई मायनों में अलग है। यह कहानी 1936 से लेकर वर्ष 1948 के दौरान की है। तब लोगों का पहनावा, बोलचाल और तौर-तरीके अलग थे। मेरे किरदार का नाम इम्तियाज शाह है। वह अपने काम को पूरी प्रतिबद्धता से करता है। काम को लेकर मेरा भी यही अप्रोच है। 1948 में तिरंगा झंडा उस देश की सरजमीं पर लहराया था, जिसने हम पर दो सौ साल शासन किया था। मुझे याद है कि 1936 के ओलंपिक के हिस्से की हम शूटिंग कर रहे थे। सामने ब्रिटिश झंडा लहरा रहा था। हम उसके लिए खेल रहे थे। 1936 में भारत ने जीत की हैट्रिक लगाई थी। वहां का माहौल ऐसा बन गया था कि सभी लोगों की आंखों में आंसू थे। फिर पता चला कि 1948 में पहली बार अंग्रेजों की सरजमीं पर हमारा तिरंगा लहराया था। 
'गोल्ड' की शूटिंग कहां पर हुई?
हमने यूनाइटेड किंगडम में ब्रैडफोर्ट से आरंभ किया। फिर लीड, लंदन गए। हमारे साथ बंदिश यह थी कि हमें घास वाले मैदान चाहिए। दरअसल, उस दौर में घास के मैदान में हॉकी खेली जाती थी। हमें वैसे स्टेडियम की आवश्यकता थी। भारत में भी कई सारे स्टेडियम में शूटिंग हुई। खास यह है कि पहली बार लंदन और उसके आसपास शहरों में जाने का अवसर मिला। पीरियड फिल्म मैं पहली बार कर रहा हूं। अक्षय कुमार साथ भी पहली बार स्क्रीन साझा करने का मौका मिला है। 
रीमा कागती के साथ काम का कैसा अनुभव रहा? 
फिल्म बांबे टॉकीज देखने के बाद रीमा कागती ने कहा था कि मैं तुम्हारे साथ काम करूंगी। 'गोल्ड' में मुझे उनके साथ काम का अवसर मिला। रीमा की अप्रोच कमाल की है। उन्होंने हर चीज पर बारीकी से काम किया है। 

'गोल्ड' से आपने भी कुछ सीखा?
मैंने अक्षय कुमार सर से सीखा है कि कुछ भी हो जाए, मगर खुश रहो। मैं कहता भी हूं कि उन्होंने खुश रहने का टेंडर लिया है। हमने लंबे समय तक काम किया। मैंने उन्हें कभी हैरान-परेशान नहीं देखा। उन्हें अनुशासित जीवन जीते देखा। यह प्रेरणादायक है।
'मुक्काबाज 2' की भी तैयारी है?
अभी उस बारे में बात करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल मनीष मुंद्रा की फिल्म 'आधार' कर रहा हूं। सुमन घोष उसके निर्देशक है। यह फिल्म झारखंड में पहला आधार नंबर पाने वाले शख्स की कहानी है। मैं उसकी तैयारियों में मसरूफ हूं। उसके अलावा दो फिल्में कर रहा हूं। 
स्मिता श्रीवास्तव।

मुंबई(ब्यूरो)। आपकी बैक टू बैक खेल आधारित फिल्में आ रही हैं?

'मुक्काबाज' में बॉक्सिंग के अलावा भी कई मुद्दे थे। उसमें किरदार में कई लेयर थे। 'गोल्ड' में स्वतंत्र भारत के तौर पर ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के गोल्ड जीतने के अलावा संदेश भी निहित है। यह देशभक्ति की भावना से सरोबार कर देती है। इसे सिर्फ खेल आधारित फिल्म नहीं कह सकते, इसमें ड्रामा भी है। स्कि्रप्ट पढ़ने के बाद मेरी फीलिंग यह थी कि पांच फिल्में छोड़नी पड़ें तो छोड़ दूंगा, मगर इसे करूंगा। इतनी सशक्त कहानी है। 

खेल आधारित सिनेमा के क्या फायदे मानते हैं? 

स्वास्थ्य से खेल का सीधा संबंध है। खेलने से फिटनेस कायम रहती है। खिलाड़ी अपने लक्ष्य को फोकस रहते हैं। उनकी सोच बहुत पॉजिटिव होती है। कहते हैं, जहां के मैदान भरे होते हैं, वहां के अस्पताल खाली होते हैं। फिल्म के जरिये आप करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। क्या पता खेल आधारित फिल्म किसी बच्चे की भावनाओं को छू जाए। वह जिंदगी में कुछ असाधारण करने की ठान ले। 'मुक्काबाज' के बाद कई खिलाडि़यों ने मुझसे कहा कि मैंने हार मान ली थी। फिल्म देखने के बाद मैंने दोबारा कोशिश आरंभ की। खेल आधारित फिल्में आपको लगातार कोशिश करने को प्रेरित करती हैं। 

'गोल्ड' की शूटिंग का सबसे यादगार लम्हा..

हॉकी पर और भी फिल्में अतीत में बनी हैं। 'गोल्ड' उनसे कई मायनों में अलग है। यह कहानी 1936 से लेकर वर्ष 1948 के दौरान की है। तब लोगों का पहनावा, बोलचाल और तौर-तरीके अलग थे। मेरे किरदार का नाम इम्तियाज शाह है। वह अपने काम को पूरी प्रतिबद्धता से करता है। काम को लेकर मेरा भी यही अप्रोच है। 1948 में तिरंगा झंडा उस देश की सरजमीं पर लहराया था, जिसने हम पर दो सौ साल शासन किया था। मुझे याद है कि 1936 के ओलंपिक के हिस्से की हम शूटिंग कर रहे थे। सामने ब्रिटिश झंडा लहरा रहा था। हम उसके लिए खेल रहे थे। 1936 में भारत ने जीत की हैट्रिक लगाई थी। वहां का माहौल ऐसा बन गया था कि सभी लोगों की आंखों में आंसू थे। फिर पता चला कि 1948 में पहली बार अंग्रेजों की सरजमीं पर हमारा तिरंगा लहराया था। 

'गोल्ड' की शूटिंग कहां पर हुई?

अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने बताया गोल्ड के किस सीन की शूटिंग में रो पड़ी थी पूरी यूनिट

हमने यूनाइटेड किंगडम में ब्रैडफोर्ट से आरंभ किया। फिर लीड, लंदन गए। हमारे साथ बंदिश यह थी कि हमें घास वाले मैदान चाहिए। दरअसल, उस दौर में घास के मैदान में हॉकी खेली जाती थी। हमें वैसे स्टेडियम की आवश्यकता थी। भारत में भी कई सारे स्टेडियम में शूटिंग हुई। खास यह है कि पहली बार लंदन और उसके आसपास शहरों में जाने का अवसर मिला। पीरियड फिल्म मैं पहली बार कर रहा हूं। अक्षय कुमार साथ भी पहली बार स्क्रीन साझा करने का मौका मिला है। 

रीमा कागती के साथ काम का कैसा अनुभव रहा? 

फिल्म बांबे टॉकीज देखने के बाद रीमा कागती ने कहा था कि मैं तुम्हारे साथ काम करूंगी। 'गोल्ड' में मुझे उनके साथ काम का अवसर मिला। रीमा की अप्रोच कमाल की है। उन्होंने हर चीज पर बारीकी से काम किया है। 

'गोल्ड' से आपने भी कुछ सीखा?

अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने बताया गोल्ड के किस सीन की शूटिंग में रो पड़ी थी पूरी यूनिट

मैंने अक्षय कुमार सर से सीखा है कि कुछ भी हो जाए, मगर खुश रहो। मैं कहता भी हूं कि उन्होंने खुश रहने का टेंडर लिया है। हमने लंबे समय तक काम किया। मैंने उन्हें कभी हैरान-परेशान नहीं देखा। उन्हें अनुशासित जीवन जीते देखा। यह प्रेरणादायक है।

'मुक्काबाज 2' की भी तैयारी है?

अभी उस बारे में बात करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल मनीष मुंद्रा की फिल्म 'आधार' कर रहा हूं। सुमन घोष उसके निर्देशक है। यह फिल्म झारखंड में पहला आधार नंबर पाने वाले शख्स की कहानी है। मैं उसकी तैयारियों में मसरूफ हूं। उसके अलावा दो फिल्में कर रहा हूं। 

स्मिता श्रीवास्तव।

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