- सरकारी विभागों में थोड़े से काम के लिए भी देने होते हैं रुपये

- पुलिस में भ्रष्टाचार के मामले हो चुके हैं दर्ज

आगरा. आजादी के बाद 71 वर्षो में सरकारी सिस्टम जितना मजबूत हुआ, घूसखोरी ने उसे उतना ही खोखला किया. मौजूदा समय में शायद ही ऐसा कोई सरकारी विभाग हो जहां घूसखोरी हावी न हो. छोटे-छोटे कामों के लिए लोगों को विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. अगर कोई जल्दी काम करवाना चाहे तो उसे रिश्वत देनी पड़ती है. ऐसे में सवाल है कि आखिर इस घूसखोरी से आमजन को कब मुक्ति मिलेगी?

यहां बिना रिश्वत नहीं होता काम

बिजली विभाग एक ऐसा विभाग है, जहां पर रोज सैकड़ों की संख्या में लोगों का आना-जाना होता है. यहां पर लोगों के बिल से संबंधित मामले होते हैं. किसी का बिल अधिक आता है या फिर किसी का अनिश्चित बकाया. ऐसे कई मामले होते हैं, जिन्हें ठीक कराने के लिए लोग चक्कर काटते हैं. छोटे से काम को ठीक कराने के लिए लोगों को घूस देनी पड़ती है. बिना घूस के यहां पर कोई काम नहीं होता.

पुलिस भी नहीं किसी से कम

वैसे तो पुलिस हमारी सुरक्षा और मदद के लिए है, लेकिन बिना रिश्वत दिए यहां भी कोई काम नहीं होता. एक मोबाइल गुम हो जाने के बाद शिकायत बिना रुपये दिए दर्ज नहीं हो सकती. इसके अलावा अन्य कई शिकायतों में वसूली के मामले प्रकाश में आए हैं. लोगों को पकड़ने और छोड़ने के मामलों में भी रुपयों का बड़ा रोल है. ट्रैफिक पुलिस में भी भारी वाहनों की नो एंट्री में एंट्री के लिए घूस ली जाती है. उन्हें एक पर्ची थमा दी जाती है, जिसके बाद उस गाड़ी को कोई नहीं रोकता.

शिक्षा के मंदिर में रिश्वत का बोलवाला

डॉ. भीमराव आम्बेडकर यूनिवर्सिटी में रोज सैकड़ों की संख्या में स्टूडेंट्स पहुंचते हैं. कारण है यहां पर काम की लेटलतीफी, लेकिन इसके बाद भी बिना घूस के किसी का कोई काम नहीं हो सकता. मार्कशीट और डिग्री के लिए लोगों को रुपया देना पड़ता है. डिग्री न मिलने से कई लोगों की नौकरी पर बन आती है. यहां पर दलालों का भी भंडार है, जो विभाग के लोगों से सेटिंग कर काम करवाते रहते हैं.

आरटीओ में रिश्वत का अंबार

आरटीओ विभाग भी घूसखोरी से अछूता नहीं है. यहां पर लाइसेंस बनवाने और रिन्यू करवाने के अलावा फिटनेस चालान आदि के नाम पर लोगों की जेब पर डाका डाला जाता है. दूर-दूर से काम कराने आए लोगों को मजबूरी में अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है. जबकि विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन अच्छा-खासा होता है, लेकिन सिस्टम का अंग बन चुकी घूस को लेने से कोई बाज नहीं आता.

नगर निगम, विकास प्राधिकरण और स्वास्थ्य विभाग भी नहीं अछूते

नगर निगम या विकास प्राधिकरण में कोई काम कराना हो तो बिना रुपयों के नहीं होगा. हर काम का अपना रेट तय है. निगम से कोई प्रमाणपत्र लेना हो या फिर विकास प्राधिकरण से किसी योजना का लाभ लेना हो. रुपया है तो सबकुछ मिल जाएगा और रुपया नहीं तो कुछ भी नहीं. इसका फायदा कुछ पैसे वाले लोग उठा लेते हैं. जो इन योजनाओं का हकदार होता है, वह रुपयों के अभाव में भटकता रहता है.