क्त्रन्हृष्ट॥ढ्ढ : राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने रांची नगर निगम क्षेत्र में सीवरेज पाइप लाइन बिछाने के तरीके और अपनाई जा रही तकनीक पर कड़ी आपत्ति का इजहार किया है. श्री पोद्दार ने राज्य के मुख्य सचिव श्री सुधीर त्रिपाठी को पत्र लिखकर इस परियोजना से सम्बंधित सभी एजेंसियों की कार्यप्रणाली की जांच और तदनुसार कार्रवाई की मांग की है. उन्होंने विगत 21 जुलाई को इस परियोजना के क्त्रियान्वयन में संलग्न अधिकारियों के साथ हुई बैठक का हवाला भी अपने पत्र में दिया है.

जिम्मेवारी लेने को कोई तैयार नहीं

दिलचस्प पहलू यह है कि इस परियोजना के क्रियान्वयन से करीब आधा दर्जन एजेंसियां जुड़ी हुई हैं लेकिन जिम्मेवारी लेने को कोई भी तैयार नहीं दिखता. परियोजना के क्रियान्वयन का तरीका अत्यधिक निराशाजनक है, परियोजना का बेसिक काम अर्थात सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण अबतक हुआ ही नहीं है लेकिन शहर में एक साथ जगह-जगह बरसात के मौसम में सड़कें खोदकर छोड़ दी गयी हैं. कई जगहों पर सीवर के पाइप डालकर उन्हें केवल मिट्टी से ढंककर छोड़ दिया गया है. इस वजह से सड़कें और गलियां कीचड़मय हो गयी हैं और लोगों का चलना-फिरना दुश्वार हो गया है.

रोलर के बिना कैसे हुआ काम

बताया गया कि एजेंसी के पास अपेक्षित चौड़ाई का रोलर है ही नहीं लेकिन करीब 100 किलोमीटर लम्बी सीवर लाइन का निर्माण पूरा हुआ बताया जा रहा है. अब जबकि एजेंसी के पास वांछित विशिष्टता का रोलर ही नहीं है तो इस 100 किलोमीटर लम्बी सीवरेज लाइन की कॉम्पेक्टिंग कैसे हो गयी यह भी यक्ष प्रश्न है. आनेवाले समय में जब बिना कॉम्पेक्टिंग की सड़क धंसेगी तो क्या हाल होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. निगम के लोगों ने ही स्वीकार किया कि कंक्त्रीट के जरिये सड़क को पूर्ववत समतल बनाने के बाद सही तरीके से क्युरिन भी नहीं किया गया अर्थात सड़क का भविष्य वैसे भी संदिग्ध ही है.

12 साल पुराने डीपीआर पर काम

श्री पोद्दार ने कहा है कि रांची शहर के लिए सीवरेज-ड्रेनेज परियोजना सर्वप्रथम 2006 में शुरू हुई थी और तभी सिंगापुर की मैनहर्ट कंपनी ने डिजाईन और डीपीआर तैयार किया था. करीब 12 साल बाद भी पुरानी डिजाईन और डीपीआर के आधार पर ही टेंडर हो गया और परियोजना का क्रियान्वयन हो रहा है.

बढ़ती जा रही है लागत की राशि

परियोजना की प्राक्कलित राशि 359 करोड़ रुपये है किन्तु अब कन्फर्मेटरी सर्वे के साथ नए तथ्य और डाटा जुड़ रहे हैं, उसके हिसाब से ही परियोजना राशि में भी परिवर्तन हो रहा है और हालत यह है कि परियोजना के क्रियान्वयन में लगी पूरी टीम में से संभवत: किसी को नहीं पता कि इस परियोजना में कुल कितनी राशि खर्च होगी. जब निविदा निष्पादित हुई थी तो प्रस्तावित सीवरेज लाइन की कुल लम्बाई 192 किलोमीटर थी जो अबतक बढ़कर 280 किलोमीटर हो चुकी है.

सिर्फ 3.5 किमी लम्बा है ड्रेनेज

परियोजना कहने को तो सीवरेज-ड्रेनेज से सम्बंधित है लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि काम केवल सीवरेज का ही हो रहा है. नगर निगम की टीम ने जो जानकारी उपलब्ध कराई, उसके अनुसार मात्र 3.5 किलोमीटर लम्बे ड्रेनेज का ही निर्माण हो रहा है. यह समझना कठिन नहीं कि बगैर ड्रेनेज के सीवरेज सिस्टम भी निष्प्रभावी साबित होगा और शहर की सड़कों/गलियों की स्थिति भी आनेवाले समय में नारकीय होगी.