- फॉर्मूला बदलने के बाद भी रोजाना एक लाख से ज्यादा का बिक रहा स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन

- शहर से लेकर गांव तक यूथ कर रहे इस्तेमाल, असमय हो रही मौत

केस वन

रायगंज निवासी एक व्यापारी के बेटे के पेट में एक बार दर्द हुआ. पड़ोस के एक मेडिकल स्टोर संचालक से उसने स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन कैप्सूल ली. इससे दर्द से आराम मिला. कुछ दिन बाद फिर दर्द शुरू हुआ तो युवक ने फिर यह दवा ली. धीरे-धीरे उसे इस दवा का एडिक्ट हो गया. दवा से हल्का-हल्का सुरूर छा रहा था, जिससे वह रोजाना 25-30 कैप्सूल इस्तेमाल करने लगा. इससे उसका शरीर कमजोर होता गया और एक दिन उसकी मौत हो गई.

केस दो

उरुवा बाजार इलाके के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के बेटे को स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन कैप्सूल की लत लग गई. वह एक दिन में 50 कैप्सूल तक खाने लगा. शरीर कमजोर होता जा रहा, तो घर वालों ने उसपर नजर रखनी शुरू कर दी. एक दिन घर वालों ने उसे कैप्सूल खाते पकड़ लिया तो इसकी जानकारी हुई. उन्होंने डॉक्टर्स से दिखाने के बाद उसे नशा मुक्ति केंद्र पर काफी समय रखा. तब कहीं जाकर उसका यह नशा खत्म हुआ

यह दो केस एग्जामपल भर हैं. ऐसे ही ढेरों यूथ हैं जो रोजाना मेडिकल स्टोर पर बेनामी डॉक्टर्स की पर्ची लेकर पहुंचते हैं और नीला कैप्सूल की मांग करते हैं. पेट दर्द की अचूक दवा स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन जमकर नशे के लिए इस्तेमाल की जा रही है. हालत यह है कि इस दवा की मांग इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि गोरखपुर की दवा मंडी में रोजाना एक लाख रुपए के कैप्सूल की बिक्री हो रही है. एक कैप्सूल से शुरू हुई यह लत कब रोजाना दर्जनों कैप्सूल तक पहुंच जा रही है किसी को पता ही नहीं चल रहा है. इसकी वजह से शरीर कमजोर होता गया और सैकड़ों युवाओं की मौत तक हो चुकी है.

फार्मूला बदला, फिर भी जमकर इस्तेमाल

दरअसल स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन कैप्सूल में मिली डेक्स्ट्रामार्फेन नाम की दवा से नशा होता था. पेट दर्द से लोगों को तत्काल राहत देने के लिए यह दवा मिलाई जाती थी. इसकी शिकायत के बाद सरकार के हस्तक्षेप पर स्पास्मोप्रॉक्सीवॉन का फार्मूला बदल दिया गया. डेक्स्ट्रामार्फेन को हटाकर ट्रामाडाल, डाइसाइक्लोमिन और एसिटामिनोफेन के फार्मूले के साथ स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन प्लस नाम से दवा को लांच की गई. लेकिन फॉर्मूला चेंज होने के बाद भी इसका असर नहीं नजर आया और अब भी यूथ इसका जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं. अब यूथ के बीच यह 'नीला कैप्सूल' के नाम से फेमस है और वह इसे कहकर ही इसकी खरीदारी कर रहे हैं.

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दर्द की दवा, अफीम सा नशा

मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित शाही ने बताया कि युवा दर्द की दवा नशे के रूप में ले रहे हैं. जिससे उनकी जान को खतरा है. इन दवाइयों का असर अफीम के नशे सा होता है. जब धीरे-धीरे डोज बढ़ने लगती है तो इसके साइड इफेक्ट भी नजर आने लगते हैं. डॉक्टर्स की मानें तो इससे सांस रुकने तक का खतरा रहता है. ऐसे मरीजों को मानसिक रोग विभाग में भर्ती कर इस खतरनाक जहर की लत छुड़ाई जाती है. इसमें कुछ केसेज में जिम्मेदारों को कामयाबी मिल जाती है, लेकिन 40 परसेंट केस ऐसे आते हैं, जिसमें लत नहीं छूटती और कोर्स पूरा करने के बाद यूथ फिर से नशे की राह पकड़ लेते हैं.

ऐसी दवा छोड़ने में होती है परेशानी

-पेट में दर्द के साथ एठन होना

-आंख, मुंह, नाक से पानी गिरना

-हाथ-पैर में दर्द, शरीर में अकड़न, रोंगटे खड़े होना

-घबराहट बेचैनी

हर दिन ऐसे मरीज पहुंच रहे अस्पताल

जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में यूं तो नशे से जुड़े मामलों केसेज की भरमार है, लेकिन इसमें चुनिंदा कई केस स्पास्मो का नशा करने वाले भी पहुंच रहे हैं. जिम्मेदारों की मानें तो जिला अस्पताल में रोजाना चार से पांच मरीज पहुंच रहे हैं, जबकि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पहुंचने वाले ऐसे मरीजों की तादाद 10 के आसपास है. यह नशे के तौर पर दर्द की दवाइयों का सेवन करते हैं. ऐसे मरीजों को मानसिक रोग विभाग के वार्ड में भर्ती कर इलाज किया जा रहा है.

स्पास्मो प्रॉक्सीवॉन प्लस कैप्सूल ज्यादा सेवन करना खतरनाक होता है. इससे किडनी खराब हो जाती है. मेडिकल स्टोर पर आसानी से यह दवा मिल जाती है, इसलिए युवा इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं. परिजनों को भी ध्यान देना होगा कि उनके बेटे-बेटी क्या कर रहे हैं. यदि यूथ इसका इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें लेकर तत्काल डॉक्टर से मिलने में ही भलाई है.

डॉ. अखिलेश सिंह, सीनियर फिजीशियन